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पृथ्वी दिवस: भारत में अब कभी भी मच सकती है तबाही, इसके पीछे है यह बड़ी वजह

Mon, 23 Apr 2018 09:32 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
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देश में अब कभी भी आपदा आ सकती है। इसके संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं। आगे जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह...

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ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदल रहे मौसम के मिजाज से अब सबसे अधिक प्रभावित हिमालय हो रहा है। हिमालय को जलवायु नियंत्रण का ‘ग्लोबल स्टेबलाइजर’ कहा जाता है। मौसम के बर्ताव के असमान्य हो जाने से हिमालय में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या दोगुनी हो गई  है, इसके साथ ही यह भी तय नहीं है कि प्राकृतिक आपदाएं कब आएंगी?

हिमालयी क्षेत्र में कभी भी किसी भी मौसम में प्राकृतिक आपदाएं घटित हो सकती हैं। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ भूगर्भ विज्ञानी डॉ. वीसी ठाकुर का कहना है कि इससे कृषि, औद्योनिकी समेत सभी क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ रहा है।
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पृथ्वी दिवस के मद्देनजर अमर उजाला से बातचीत में वाडिया के पूर्व निदेशक डॉ. वीसी ठाकुर ने बताया कि कि हिमालय देश की जलवायु को नियंत्रित करता है। इसके साथ ही हिमालय और तिब्बती प्लेटों की वैश्विक ‘सरकुलेशन’ में भी अहम भूमिका है।

यहां का पर्यावरण खराब नहीं होने देना चाहिए। वैसे जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे विश्व में प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं, लेकिन हिमालय इससे अधिक प्रभावित हो रहा है। पहले बारिश के दिनों में ही प्राकृतिक आपदाएं आती रहीं, लेकिन अब अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि कब तूफान आ जाएगा।

बादल फटने, अचानक बर्फीला तूफान आने, इकट्ठी बारिश होने से मिट्टी का क्षरण हो रहा है। इस संबंध में विज्ञानी डॉ. समीर तिवारी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के असर से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं।

ट्री लाइन बढ़ती जा रही है। इससे वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं और इनके फूलने का समय भी बदल गया है। हिमालयी क्षेत्र में ये बदलाव अब दिखने लगे हैं। विज्ञानियों का मशविरा है कि ऐसी स्थिति में मानव हस्तक्षेप से होने वाले दुष्प्रभावों को तो रोका जा सकता है। हिमालयी क्षेत्र में आबादी का दबाव न बढ़ने दें।
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पृथ्वी दिवस के मौके पर जागरूकता कार्यक्रम किया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए उत्तराखंड क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान लागू किया जा रहा है। हिमालयी इको सिस्टम को सहेजने तथा मृदा संरक्षण के लिए योजनाएं हैं। नदियों में प्रदूषण रोकने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। दो-तीन साल में प्रदूषण पर लगाम लग जाएगा।
-अमित सिंह नेगी, सचिव आपदा प्रबंधन एवं वित्त

हिमालयी क्षेत्र की वनस्पतियों, मिट्टी की क्वालिटी में जलवायु परिवर्तन से आए फर्क के संबंध में अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए वर्ष 1920 के सांख्यिकी प्लाट और आज की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। इससे क्लाइमेट चेंज का पता चलेगा। इसके साथ ही वनस्पतियों में आ रहे बदलाव के संबंध में प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं।
-संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, अनुसंधान वृत्त
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