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पृथ्वी दिवस : यूरोपीय देशों के प्रदूषण से बिगड़ रहा हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र, शोध में हुआ खुलासा

Mon, 22 Apr 2019 06:11 PM IST
अलका त्यागी अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून  
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- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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प्रदूषण का असर जहां इंसानों की जिंदगी पर दिखाई देने लग गया है वहीं बर्फ से आच्छादित पर्वत भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की ओर से किए हालिया शोध में यह बात सामने आई है कि यूरोपीय देशों में बढ़ते प्रदूषण का असर हिमालय पर भी पड़ रहा है। पश्चिमी विक्षोभ के जरिए भारी मात्रा में कार्बन-डाई-आक्साइड हिमालयी क्षेत्रोें में पहुंच रही है। इससे हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ रहा है।

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पश्चिमी विक्षोभ के साथ ही देश में प्रदूषण स्तर में आ रहे बदलावों के चलते हिमालयी के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहे प्रभावों का अध्ययन करने को लेकर हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की ओर से गंगोत्री ग्लेशियर के निकट चीड़बासा और भोजबासा में दो मानीटरिंग स्टेशन की स्थापना की है।

इसके जरिए हिमालयी क्षेत्रों मेें कार्बन समेत अन्य गैसों के प्रभावोें का अध्ययन किया जा रहा है। शोध में जुटे वैज्ञानिकों का दावा है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है। यह पहली बार है जब संस्थान के वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्बन की बढ़ती मात्रा का अध्ययन किया है।
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0.1 से चार माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक मापी मात्रा

वाडिया के वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले एक साल के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पश्चिमी विक्षोभ के चलते उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कभी कार्बन का स्तर 0.1 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तो कभी चार माइक्रोग्राम तक मापा गया है। बारिश के दौरान कार्बन की मात्रा कम पाई गई है।

अगले साल के डाटा का अध्ययन करके यह जानकारी जुटाई जाएगी कि आखिरकार कार्बन की मात्रा किस दर से बढ़ रही है। पृथ्वी दिवस पर इस बार की थीम ‘प्रोजेस्ट ऑवर स्पेसीज’ रखी है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों का कहना है यदि मानव जीवन सुरक्षित रखना है तो धरती की सभी प्रजातियों का संरक्षण करना होगा। 
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कैसे बचेगी पृथ्वी?

वाडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी का कहना है कि पृथ्वी अकेला ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन है। कल्पना की जा रही है कि ब्रह्मांड में कई अन्य ग्रहों पर भी जीवन है। लेकिन, अभी तक इसके ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। यदि पृथ्वी को बचाना है तो ओजोन परत को बचाना होगा। दुनिया में अधिक से अधिक वनीकरण करने के साथ ही सूख रही नदियाें का संरक्षण करना होगा। प्रदूषण कम करने को लेकर ठोस कदम उठाने होंगे। 

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है यह खतरनाक स्थिति है। यूरोपीय देशों में तेजी से खतरनाक हो चुका प्रदूषण इसकी वजहों में से एक है। पश्चिमी विक्षोभ के जरिए कार्बन की भारी मात्रा हिमालयी क्षेत्रों में पहुंच रही है। यदि समय रहते इसे रोकने के लिए ठोस नीतियां नहीं बनाई तो हिमालयी क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ने का नतीजा सबको भुगतना होगा।
-डॉ. पीएस नेगी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी
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