फुलवारी में अपने आप खिलते हैं नगरास के सुगंधित पुष्प
देव को अर्पित किया जाता है पुष्प, भक्तों को मिलता है प्रसाद
सर्दियों के मौसम में जौनसार बावर के हनोल स्थित महासू देवता मंदिर का परिसर देव फुलवारी में खिले नगरास के फूलों से महकता है। महासू देवता को नगरास का पुष्प बहुत प्रिय है। उनके हनोल में प्रकट होने के साथ यहां नगरास के फूल भी खिलने लगे। यह देव पुष्प सांध्यकालीन आरती में देवता को अर्पित किए जाते है। पांच घंटे बाद रात को नौ बजे यह पुष्प प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित कर दिया जाता है।
परंपरा के अनुसार सावन के महीने में तांदूर मुहासे फुलवारी में खोदाई करते हैं, जिसके बाद नगरास के फूल सर्दियों के मौसम में स्वयं खिल उठते हैं।
महासू देवता मंदिर परिसर स्थित देव फुलवारी को भक्त उनका चमत्कार मानते हैं। यहां बिना किसी बीज या पौध के नगरास के फूल खिलते हैं। फुलवारी को लेकर महासू देवता के चमत्कार की एक कहानी प्रचलित है। मंदिर समिति के सचिव मोहन लाल सेमवाल बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष सावन की 25 गते को एक शूकर फुलवारी की खोदाई के लिए आता था। सुबह जब पूरी फुलवारी खोदी हुई मिलती, तो सभी लोग हैरान हो जाते थे।
चातरा गांव के लोगों ने एक दिन खोदाई करने वालों का पता लगाने के लिए योजना बनाई। ग्रामीण मंदिर के आसपास छिपकर बैठ गए। शूकर अपने तय समय पर खोदाई के लिए आया तो ग्रामीणों ने उसको घात लगातार मार दिया। उसके बाद से फुलवारी में नगरास के फूल खिलने बंद हो गए।
मोहन लाल सेमवाल ने बताया कि पूरे गांव पर देव दोष लग गया। गांव वालों ने महासू देवता के समक्ष पश्चाताप करते हुए क्षमा याचना की। न्याय के देवता महासू महाराज ने गांव वालों को दोषमुक्त करते हुए प्रत्येक वर्ष फुलवारी की खोदाई के आदेश दिए। तांदूर मुहासे तब से पीढ़ी दर पीढ़ी सावन की 25 गते को फुलवारी की खोदाई कर छोड़ देते हैं। उसके बाद दिसंबर और जनवरी के बीच नगरास के फूल खिल उठते हैं।
फुलवारी बिल्कुल मंदिर के गर्भगृह के पास स्थित है। जब दिसंबर और जनवरी में फुलवारी में नगरास के सफेद और पीले फूल खिलते है तो उनकी महक खिड़की से मंदिर के गर्भगृह तक जाती है। महासू देवता को शाम चार बजे होने वाली आरती में यह पुष्प चढ़ाया जाता है, तब से यह परंपरा चली आ रही है।