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जिनकी सांसें बंद, वो बूढ़े पेड़ छोड़ेंगे जंगल

Thu, 06 Apr 2017 11:06 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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forest fire - फोटो : demo pic
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उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र समेत देश के सभी वनों में सांस न ले पाने वाले बूढ़े और मृत पेड़ों को हटाया जाएगा।
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पुराने हो चुके सूखे और खोखले पेड़ आक्सीजन तो देते नहीं हैं, लेकिन इनके अंदर चल रही बैक्टीरियल क्रिया के कारण सड़न से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने देश में पहली बार ऐसे पेड़ों को हटाने के लिए आकलन शुरू कर दिया है। उत्तराखंड, यूपी, हरियाणा और पंजाब में आकलन के पहले चरण का कार्य पूरा हो गया है।
 
कार्बन उत्सर्जन से बढ़ रहे ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के मद्देनजर भारतीय वन सर्वेक्षण ने जंगलों में पुराने पेड़ों को हटाने के लिए यह आकलन शुरू किया है। पुराने पेड़ों को हटाने के बाद नई पौध लगाई जाएगी, जिससे जंगलों की सेहत सुधरेगी। पुराने पेड़ों की संख्या हिमालयी क्षेत्र में अधिक है।
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विज्ञानियों का कहना है कि बूढ़े और बीमार पेड़ों में कार्बन स्टाक तो रहता है, लेकिन इनकी सांस लेने की क्रियाबंद होने के कारण ये आक्सीजन नहीं छोड़ते और न ही वातावरण का कार्बन सोखते हैं। इससे इनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। इसके अलावा जो पेड़ खोखले हो गए हैं, उनके अंदर बैक्टीरिया रहते हैं। वे जब पेड़ों की कोशिकाओं को खाकर नष्ट करते हैं तो उससे कार्बन उत्सर्जन होता है। कुछ कार्बन वातावरण में आता है और कुछ मिट्टी में जाकर मिलता है।

खासतौर पर जड़ों के नष्ट होने के बाद यह कार्बन अंदर मिट्टी में रहता है। एफएसआई के विज्ञानियों का कहना है कि पेड़ों की कटान प्रतिबंधित होने से भी लोग लकड़ी के लिए पुराने पेड़ों को नहीं काटते। इससे भी पुराने पेड़ों की संख्या बढ़ गई है। देश भर के जंगलों का आकलन होने के बाद एफएसआई अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देगा।
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पूरे देश में पेड़ों की गणना एवं उनमें शोषित कार्बन का आकलन किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक नए मानक गणना पद्धति में शामिल किए गए हैं। मृत और बीमार पेड़ों का भी आकलन किया जा रहा है।
- प्रकाश लखचौरा, निदेशक (फोरेस्ट इंवेंटरी) एफएसआई
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