जल स्रोतों के सूखने की वजह से उत्तराखंड में गंभीर पेयजल संकट की स्थिति लगातार बन रही है। ऐसी बस्तियां भी जल स्रोतों के सूखने से पेयजल संकट की चपेट में आ रही हैं, जहां अमूमन पानी की कोई दिक्कत नहीं रही है।
इस साल सिर्फ चार महीने में ही 212 बस्तियां ऐसी चिह्नित कर ली गई हैं, जो जल स्रोतों के सूखने से पेयजल संकट की जद में आ गई हैं। सरकारी भाषा में ऐसी बस्तियों को स्लिप्ड बैक बस्तियां कहा जा रहा है। जल स्रोतों के सूखने के तेजी से बढ़ते संकट के बाद सरकार अब ऐसी दूरगामी कार्ययोजना बनाने में जुटी है, जिससे स्थिति को संभाला जा सके। तात्कालिक राहत के बहुत ठोस उपाय सरकार के पास फिलहाल तो नजर नहीं आ रहे हैं।
दरअसल, सरकार की ये भी दिक्कत है कि उसके पास उत्तराखंड के जल स्रोतों का भरोसेमंद डाटा उपलब्ध नहीं है। पहली बार सरकार ने 500 जल स्रोतों की जियो टैगिंग कराई है, उसी में बेहद खराब स्थिति सामने आई है। सरकार चरणबद्ध तरीके से 5000 जल स्रोतों की जियो टैगिंग कराने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही है। ऐसे में साफ है कि उसकी पहली प्राथमिकता जल स्रोतों का भरोसेमंद डाटा तैयार करना है। उपचार की बात उसके बाद शुरू होगी। हालांकि, सरकार का दावा है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग और अन्य उपायों के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिश की जा रही है।
स्लिप्ड बैक बस्तियां : साल दर साल एक नजर
मंडल कुल बस्तियां 2013-14 2014-15 2015-16 2016-17 2017-18
वर्तमान तक
गढ़वाल 20558 1924 221 3113 803 84
कुमाऊं 18651 2210 49 1513 617 128
योग 39209 4134 270 4626 1420 212
जल स्रोतों के सूखने का निश्चित तौर पर पेयजल आपूर्ति पर असर पड़ता है। यह बहुत बड़ा विषय है, क्योंकि जल स्रोतों की संख्या बहुत ज्यादा है। अभी तक इनका विश्वसनीय डाटा ही उपलब्ध नहीं है। हम डाटा भी तैयार कर रहे हैं। साथ ही साथ सीमित संसाधनों के बावजूद स्थिति पर नियंत्रण पाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
- प्रकाश पंत, पेयजल मंत्री, उत्तराखंड