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उत्तराखंडः केवल साइन कर 40 हजार कमा लेते हैं डॉक्टर

Sat, 07 Feb 2015 01:18 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में कुछ सरकारी अस्पतालों के अधीक्षकों के हस्ताक्षर उनकी अतिरिक्त कमाई का जरिया बन गए हैं। अस्पतालों से जारी किए जाने वाले चिकित्सा प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर से ही अधीक्षक हर माह बीस से चालीस हजार रुपये तक कमा रहे हैं।
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खास बात यह है कि इन अधीक्षकों ने चिकित्सकों के प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगा दी है। ऐसे में जांच भले चिकित्सक करते हों, लेकिन रकम अधीक्षक की जेब में जा रही है। अधीक्षकों के फैसले का चिकित्सकों ने विरोध शुरू कर दिया है।

वे अधीक्षकों को तानाशाह और प्रमाणपत्र जारी करने पर लगी रोक को ‘हक’छीनना करार दे रहे हैं। दून अस्पताल के डॉक्टरों ने इस मामले की शिकायत स्वास्थ्य मंत्री और महानिदेशक से करने की तैयारी कर ली है।
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यह है व्यवस्था
भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के नियमों के मुताबिक, राज्य परिषद में पंजीकृत हर डॉक्टर को अपने मरीज का चिकित्सा प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार है। उत्तराखंड सरकार के शासनादेश के मुताबिक, सरकारी अस्पताल में चिकित्सा प्रमाणपत्र बनाने का आधा शुल्क  सरकार और आधा संबंधित चिकित्सक के खाते में जाएगा।

150 रुपये है शुल्क  
दून अस्पताल में चिकित्सा प्रमाणपत्र बनवाने का शुल्क 150 रुपये तय है। व्यवस्था के मुताबिक इसमें से 75 रुपये सरकार और 75 रुपये संबंधित को मिलने चाहिए।

अधीक्षक उठा रहे लाभ
दून अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डा. आरएस असवाल ने अस्पताल के डॉक्टरों के प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगा दी है। अब वे खुद अपने हस्ताक्षरों से प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। यह बात अलग है कि जांच चिकित्सकों से ही करवाई जा रही है। अस्पताल में हर महीने औसतन 80 हजार रुपये प्रमाणपत्रों की कमाई है, यानी 40 हजार रुपये अधीक्षक की जेब में जा रहे हैं।
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...तो अदालत भी वही जाएं

मेडिको लीगल केस में चिकित्सा प्रमाणपत्र बनाने वाले चिकित्सक को अदालतों के चक्कर भी काटने पड़ते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि प्रमाणपत्र बनवाने वाले की चिकित्सीय जांच संबंधित बीमारी के विशेषज्ञ डॉक्टर या मरीज का इलाज करने वाले डॉक्टर द्वारा ही की जाती है। चिकित्सा अधीक्षक सिर्फ प्रमाणपत्र पर साइन करते हैं। इसके बावजूद आधा शुल्क अधीक्षक खुद डकार रहे हैं। उनका कहना है कि यही हाल रहा तो कानूनी मामलों में अदालत भी उन्हें ही जाना चाहिए।

यहां पड़ती है जरूरत
चिकित्सा प्रमाणपत्र की जरूरत बच्चों के स्कूल में दाखिले के वक्त, स्कूल या कार्यालय में अवकाश लेने के लिए पड़ती है। इसके अलावा नौकरी लगने पर फिटनेस प्रमाणपत्र बनाया जाता है।

यह तो हिटलरशाही है। डॉक्टरों के अधिकारों के साथ उनके सम्मान पर भी चोट की जा रही है। राजधानी में भी दून अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक ऐसा कर रहे हैं। मैंने अध्यक्ष रहते हुए इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन यह खेल एक गिरोह के तौर पर चल रहा है। डॉक्टर आवाज उठा रहे हैं तो उनका पूरा साथ दूंगा।
-डा. बीसी रमोला, पूर्व अध्यक्ष, प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ

संघ हमेशा इसके विरोध में रहा है। दून अस्पताल समेत प्रदेश के कुछ अन्य अस्पतालों से भी ऐसी शिकायतें मिली हैं। डॉक्टरों के सम्मान से खिलवाड़ नहीं होने देंगे। डॉक्टर शिकायत करें तो आवाज उठाई जाएगी।
-डा. बीएस जंगपांगी अध्यक्ष, प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ

करीब दो साल पहले आदेश हुआ था कि चिकित्सा प्रमाणपत्र अस्पताल के कार्यालय की ओर से ही जारी किए जाएं, ताकि अदालती कार्रवाई या सूचना का अधिकार में जानकारी देने के दौरान कार्यालय के पास जानकारी रहे। दून अस्पताल में इसी आदेश का पालन किया जा रहा है।
-डा. आरएस असवाल, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, दून अस्पताल
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