उत्तराखंड शासन ने रियायती शिक्षण शुल्क (सब्सिडाइज्ड फीस) पर मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं के कंपल्सरी सर्विस बांड (अनिवार्य सेवा अनुबंध) में फेरबदल किया है। अब बांड का उल्लंघन करने पर बांडेड एमबीबीएस को दो करोड़ रुपये और बांडेंड एमएस/एमडी को ढाई करोड़ रुपये भरने होंगे। शासन की मंशा है कि बांडेड धनराशि बढ़ने से कोई भी बांड से बचने का प्रयास नहीं करेगा।
राज्य के सरकारी मेडिकल कालेजों में रियायती शुल्क पर मेडिकल की पढ़ाई कराई जाती है। इसके एवज में कालेज की ओर से संबंधित छात्र-छात्रा से बांड भरवाया जाता है, जिसमें उसको श्योरिटीज (प्रतिभू) देनी पड़ती है कि वह शासन की ओर से निर्धारित समयावधि तक दुर्गम क्षेत्र में स्थित सरकारी अस्पताल में सेवा देगा। अगर वह बांड की शर्तों का पालन नहीं करता है, तो वह सरकार को पढ़ाई में हुए खर्चे को चक्रवृद्धि ब्याज सहित लौटाएगा।
प्रतिभू धनराशि के संबंध में समय-समय पर शासनादेश जारी हुए हैं। 23 जुलाई 2008 को शासनादेश जारी करते हुए अनिवार्य सेवा न करने वाले एमबीबीएस डॉक्टर को हर्जाने के रुप में एकमुश्त 30 लाख रुपये जमा कराने के लिए कहा गया। इसके बाद 23 मई 2013 को संशोधन करते हुए नया शासनादेश जारी हुआ। इसमें अभ्यर्थी की ओर से दो श्योरटीज भी बांड में हस्ताक्षर करते हैं, जिसमें अभ्यर्थी और श्योरटीज यह शपथ करते हैं कि अनुबंध तोड़ने पर वह साढ़े चार साल का मेडिकल का शिक्षण शुल्क (प्रतिवर्ष 4 लाख रुपये) चक्रवृद्धि ब्याज की दर से जमा कराएंगे।
कड़ी शर्तों के बावजूद बांडेड डॉक्टर बांड तोड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं। चिकित्सा विभाग से नियुक्ति मिलने के बावजूद वह ज्वाइन नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा कोर्ट में बांड के खिलाफ जाने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। इसे देखते हुए शासन के चिकित्सा शिक्षा अनुभाग ने फिर एक और संशोधन किया है।