देशभर में बृहस्पतिवार को दीपावली मनाई जाएगी, लेकिन जौनसार बावर क्षेत्र में इस पर्व के साथ एक और दीपावली मनाई जाएगी। यह पर्व ठीक एक महीने के बाद होगा। मौजूदा दीपावली में जौनसारी संस्कृति की झलक ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देगी।
जौनसार बावर की अपनी संस्कृति व परंपराओं के लिए विशेष पहचान है। पूर्व के समय में इस क्षेत्र में आमतौर पर मनाई जाने वाली दीपावली के एक माह बाद अमावस्या की रात अथवा पूर्व चौदस की रात से जौनसारी दीपावली की शुरुआत होती है। यहां की लोकभाषा में दीपावली पर्व को भिरूड़ी और बराज नाम से जाना जाता है। पर्व पर प्रत्येक गांव में जश्न का वातावरण रहता है। महिला व पुरुष गांवों के पंचायती आंगनों में एकत्रित होकर लोकगीतों और नृत्यों में शामिल होते हैं। उसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रो से विभिन्न धुन बजाते हुए गांव के बाहरी स्थानों पर जाकर आग की मशाल जलाते हैं। भीमल के पेड़ की टहनियों पर घास बांधकर बनाए गए होलो को सिर के ऊपर से घुमाकर नृत्य किया जाता है।
होलो को हुलियात यानि मशाल रखने के स्थान पर डाल दिया जाता है। इस मौके पर घरों में चावल को कूटकर बनाया गया चिवड़ा, आटे में गुड़ मिलाकर बनाई जाने वाली पूड़ी, हलवा व्यंजन बनाकर अतिथियों को परोसा जाता है। इस दौरान अखरोट भी मेहमानों को भेंट किए जाते हैं। उधर, पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्र में देश के साथ मनाई जाने वाली दीपावली भी मनाया जाने लगा है। इसके चलते जौनसार में दीपावली दो बार मनाए जाने की परंपरा भी अब शुरू हो गई है।
उत्तराखंड जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष मूरत राम शर्मा का कहना है कि बावर व देवघार क्षेत्र में काफी समय पूर्व से ही देश के साथ मनाए जाने वाली दीपावली का पर्व मनाया जाता है। वर्तमान में कुछ अन्य क्षेत्रों दसऊ, कंंडमान, पशगांव आदि क्षेत्रों में भी नई दीपावली मनाई जाने लगी है।