दीपावली भले ही अभी एक महीना दूर है, लेकिन हम अभी से पटाखा नहीं जलाने का मन बनाएंगे तो पटाखों की बिक्री करने वाली भी मांग के हिसाब से ही माल कम मंगाएंगे। इस खबर का मकसद सिर्फ आपको यह बताना है कि सांसों का दुश्मन कोरोना वायरस प्रदूषण में और भी सक्रिय हो जाएगा और पटाखों से निकला जानलेवा धुंआ आपके किसी अजीज के लिए ही घातक साबित होगा।
विशेषज्ञ बोले, अगले चार माह तक हर तरह के प्रदूषण से बचें
सुशीला तिवारी अस्पताल के चिकित्साधीक्षक डॉ. अरुण जोशी का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन बहुत ही घातक होते हैं। कोविड के साथ ही हृदय, बीपी, सांस के मरीजों में फेफड़े के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कोविड से जंग लड़कर ठीक होने की दिशा में बढ़ रहे लोगों को भी दिक्कत हो सकती है। कोविड मरीजों के फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है।
वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. गौरव सिंघल का कहना है कि पटाखे का धुआं खतरनाक होता है। सीओपीडी, अस्थमा रोगियों में संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। पटाखों से निकलने वाले रसायन का धुआं वातावरण में घुल जाता है और लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है। कोविड 19 के दौर में प्रयास करना चाहिए कि किसी भी तरह के प्रदूषण से बचें।
राजकीय मेडिकल कॉलेज अल्मोड़ा के प्राचार्य और वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. आरजी नौटियाल का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन वातावरण में मिल जाते हैं। सांस लेने के दौरान हमारे फेफड़ों में जाते हैं और ऑक्सीजन की मात्रा को कम करते हैं। उनका कहना है कि सभी को संकल्प लेना चाहिए कि कोविड 19 के दौर में सिर्फ दीपों के साथ दीपावली मनाएंगे और पटाखों को न कहेंगे। पीएम मोदी को भी लोगों से अपील करनी चाहिए कि इस बार पटाखे न जलाएं।
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रमनदीप आहूजा का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन में एसपीएम (सस्पेंडेट पार्टीकुलेट मैटिरयल) स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है। यह फेफड़ों में पहुंचकर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। साथ ही कैंसर का कारण बनता है। फेफड़ों को नुकसान पहुंचने से हृदय पर इसका दबाव बनता है और हृदय को अपनी क्षमता से अधिक काम करना पड़ता है।
आईवीआरआई मुक्तेश्वर के प्रभारी पुतान सिंह का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन फेफड़ों से होते हुए शरीर के अंदर जाते हैं, जिससे सांस लेने संबंधी कई परेशानियां हो सकती हैं। उल्टी, घुटन, सिर दर्द, आंखों में जलन हो सकती है। कैंसर की आशंका भी अधिक रहती है। कुछ रसायन सल्फूयरिक अम्ल में परिवर्तित होकर बारिश की बूंदों के साथ पृथ्वी पर गिरते हैं और जमीन की उर्वरता को कम करते हैं।