दिवाकर भट्ट की आंदोलनकारी तपस्या का एक बड़ा अध्याय श्रीयंत्र टापू
दिवाकर भट्ट की आंदोलनकारी तपस्या का एक बड़ा अध्याय श्रीयंत्र टापू आंदोलन (1995) और फिर खैट पर्वत उपवास रहा। 15 सितंबर 1995 को वह 80 वर्षीय सुंदर सिंह के साथ खैट पर्वत की 6 किलोमीटर लंबी खड़ी चढ़ाई तय कर उपवास पर बैठे। खैट पर्वत समुंद्रतल से लगभग 3200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। वहां स्थिति गंभीर होने लगी तो प्रशासन को वहां पहुंचना मुश्किल हो गया था। हालात को देखते हुए 15 दिसंबर 1995 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें दिल्ली वार्ता के लिए बुलाया। दिल्ली में आश्वासन तो मिला, लेकिन समाधान नहीं निकला। इसके बाद वह जंतर-मंतर पर कई दिनों तक उपवास पर बैठे और आंदोलन जारी रखा।
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वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बिष्ट बताते हैं कि 1994 में जुलाई माह में भट्ट ने नैनीताल और पौड़ी में बड़े आंदोलन खड़े किए थे। जिसमें उत्तराखंड राज्य निर्माण, वन कानूनों में संशोधन, पंचायतों का परिसीमन क्षेत्रफल के आधार पर करने, केंद्रीय सेवाओं मेें पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को 2 प्रतिशत आरक्षण लागू करने, पर्वतीय क्षेत्र में जाति के बजाय क्षेत्रफल के आधार पर आरक्षण देने और हिल कैडर को सख्ती से लागू करने की पांच सूत्री मांग प्रमुख थी।
तब भट्ट का नारा ‘घेरा डालो-डेरा डालो’ राज्य आंदोलन का स्वर बन गया था। वह अक्सर यह नारा गुनगुनाते थे और युवाओं को संघर्ष के लिए प्रेरित करते थे। 2007 में वह देवप्रयाग विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और राज्य सरकार में राजस्व एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री बने। मंत्री रहते हुए भी वह हमेशा गांव से पलायन होने को लेकर चिंतित रहते थे।