प्रदेश सरकार और कांग्रेस संगठन के बीच जंग अब खुलकर सामने आ रही है। संगठन की मानें तो बढ़ते मतभेदों की जड़ पीडीएफ है।
पहले सीएम हरीश रावत का पीडीएफ को खुलकर समर्थन और अब विधानसभा अध्यक्ष के सीएम के साथ निर्दलीय विधायकों की पैरोकारी करना संगठन के पदाधिकारियों को अखर रही है। पदाधिकारियों के लिखे पत्र से स्पष्ट है कि एक बार फिर मामला दस जनपथ जाएगा। अगर आलाकमान बढ़ते सियासी गतिरोध को शांत नहीं कर पाया तो उसका असर आगामी विधानसभा चुनाव में दिखाई दे सकता है।
पीडीएफ को साधने की आड़ में संगठन की अनदेखी पर प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारी लामबंद हो रहे हैं। पदाधिकारियों का कहना है कि पीडीएफ के समर्थन के नाम पर कांग्रेस संगठन को हाशिये पर धकेला जा रहा है। सरकार के सहयोगी मंत्री सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस संगठन पर बार-बार टिप्पणी कर रहे हैं जिनका उन्हें अधिकार भी नहीं है।
कुछ पदाधिकारी यह भी कह रहे हैं कि सरकार को पार्टी कार्यकर्ता के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी संगठन के भरोसे ही चुनाव में जाना है निर्दलीय विधायकों के भरोसे पर नहीं।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कौसानी में हुई बैठक में प्रदेश अध्यक्ष ने कहा था कि संगठन की ओर से ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की जाएगी जिससे सरकार असहज हो, इसके बावजूद सरकार के सहयोगी बार-बार बयानबाजी कर संगठन को मुंह चिढ़ाने का काम कर रहे हैं जो कांग्रेस पार्टी के हित में नहीं है।
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि निर्दलीय विधायक जिस प्रकार पार्टी संगठन पर छींटाकशी कर रहे हैं उसे सिर्फ सरकार बचाए रखने के लिए सहन करना पार्टी के हित में उचित नहीं है।
निर्दलीय विधायक प्रदेश संगठन पर लगातार बयानबाजी करते चले आ रहे हैं। यहां तक कि अब विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी अपनी ही पार्टी संगठन पर उंगली उठाने से परहेज नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि कुंजवाल के पार्टी संगठन पर की गई टिप्पणी के दूरगामी परिणाम होंगे।