भाजपा में पदाधिकारियों के विधानसभा चुनाव की दावेदारी करने पर फिर विरोध की चिंगारी सुलगने लगी है। एक जिलाध्यक्ष के इस्तीफा देने के कुछ दिन की शांति के बाद कार्यकर्ताओं में उठी मुखालफत की आवाज ने पार्टी नेतृत्व की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
हालांकि, पार्टी के शीर्ष नेता सब कुछ सामान्य होने की बात कहकर मामले को शांत करने की कोशिश में जुटे हैं। भाजपा में आमतौर पर यह परंपरा रही है कि संगठन में चुनाव तैयारी से सीधे जुड़े पदाधिकारियों को चुनाव लड़ाने से परहेज किया जाता है। खासतौर पर जिलाध्यक्ष और लोकसभा या विधानसभा चुनाव संयोजक को उम्मीदवार नहीं बनाया जाता है।
विशेष परिस्थितियों में उन्हें चुनाव मैदान में उतारा जाता है, लेकिन इसके लिए उन्हें संगठन में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ता है। परवादून जिलाध्यक्ष जितेंद्र नेगी के डोईवाला सीट से दावेदारी करने और इस्तीफा देने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा कि अन्य विभिन्न सीटों पर भी इसे लेकर पार्टी में गुटबाजी बढ़ने लगी है। ताजा मामला धर्मपुर विधानसभा सीट पर महानगर जिलाध्यक्ष उमेश अग्रवाल और चुनाव संयोजक चौधरी अजित सिंह से जुड़ा है।
धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने बाकायदा इसकी लिखित शिकायत प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू से की है। जिसमें कहा गया है कि इन पदाधिकारियों द्वारा निजी चुनावी दावेदारी के लिए संगठन का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर ये पदाधिकारी अपनी दावेदारी नहीं छोड़ते तो उन्हें तत्काल पद से कार्यमुक्त किया जाए।
शिकायत करने वालों में संगठन में विभिन्न मोर्चों, धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के तमाम पदाधिकारी, पार्षद और कई वरिष्ठ कार्यकर्ता शामिल हैं। उधर, महानगर अध्यक्ष उमेश अग्रवाल का कहना है कि प्रदेश की हरीश रावत सरकार के भ्रष्टाचार और केंद्र की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए पार्टी की रीति-नीति के तहत वे जनसंपर्क कर रहे हैं।
इससे पहले परवादून इकाई के जिलाध्यक्ष जितेंद्र नेगी ने डोईवाला सीट पर दावेदार पर एतराज जताया तो जितेंद्र नेगी ने जिलाध्यक्षी से इस्तीफा तक दे दिया। इस्तीफे पर फैसला लेने में ही पार्टी को लगभग एक महीने का समय लग गया था।