दो साल पहले जलप्रलय से केदारनाथ में जमा हुए मलबे को अब हटाने के पक्ष में भू-विज्ञानी नहीं है। उनका कहना है कि यदि मलबा हटाया गया तो यहां गड्ढा हो जाएगा और ऐसे में मंदाकिनी नदी से बाढ़ का खतरा पैदा होगा। गौरतलब है कि धाम में नरकंकाल मिलने के बाद यहां से मलबा हटाने पर सियासी गलियारे में बहस तेज हो जाती है।
जून 2013 की आपदा के बाद जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) ने सर्वेक्षण करके शासन को अगस्त 2014 में केदारनाथ का मलबा न हटाने के संबंध में रिपोर्ट भेजी थी। तब उस पर इतना ध्यान नहीं दिया गया। आपदा के दो साल पूरे होने के दिन ही 16 जून को दो और नरकंकाल मिलने के बाद नए सिरे से इस पर बहस शुरू हो गई।
पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने फिर दोहराया कि मलबे में कंकाल के रूप में और कई शव दबे हैं। इस पर मुख्यमंत्री ने मलबे पर विज्ञानियों से मशविरे की बात कही। कहा कि मलबा हटाने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं मिल पाया है। विज्ञानियों के बीच भी इस पर नए सिरे से बात हुई।
जीएसआई के उप महानिदेशक (दून) रहे विज्ञानी टीएस पांगती का कहना है कि मलबे की वजह से केदारनाथ का ‘प्लेटफॉर्म’ ऊंचा हो गया है। अगर इसे हटाते हैं तो मंदाकिनी से बाढ़ का खतरा फिर बढ़ जाएगा। यह सुझाव भी दिया कि घरों में भरे मलबे को भी वहीं डाला जाए।
मकान तोड़े जाते हैं तो उनका मलबा भी कहीं और जगह न फेंका जाए। केदारनाथ में क्षतिग्रस्त सभी निजी भवनों को भी तोड़ा जाना है। कुछ तोड़े जा रहे हैं, कई बाकी हैं।