पिथौरागढ़ के बस्तड़ी और चमोली के घाट क्षेत्र ही नहीं, बल्कि राज्य के 341 गांवों पर प्राकृतिक आपदा का खतरा मंडरा रहा है।
इन गांवों में से 69 गांव ऐसे चिह्नित किए गए हैं जो भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा के लिहाज से अतिसंवदेनशील श्रेणी में है। साल 2013 में आई त्रासदी के बाद भी इन गांवों के विस्थापन और पुनर्वास को लेकर सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग बहुत आगे बढ़ नहीं पाया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2013 में आई आपदा के दौरान 197 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 4021 लोग लापता हो गए थे। 11,091 मवेशी मारे गए थे और करीब 19,780 मकान या तो जमींदोज हो गए या फिर उन्हें भारी नुकसान पहुंचा। तबाही का यह सरकारी आंकड़ा है।
हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां करती है। आपदा के बाद सरकार के निर्देश पर आपदा प्रबंधन विभाग ने सर्वे करके राज्य भर में 341 ऐसे गांवों को चिह्नित किया जो आपदा के लिहाज से अति संवेदनशील पाए गए। सरकार ने इनके विस्थापन और पुनर्वास का निर्णय लिया। ताकि इन गांवों के ग्रामीणों को अन्यत्र विस्थापित कर आपदा से बचाया जा सके।
2013 त्रासदी के तीन साल बाद भी आपदा के लिहाज से संवेदनशील इन गांवों के ग्रामीणों के विस्थापन की बात तो दूर, सरकार इनका भूगर्भीय सर्वेक्षण तक नहीं पूरा कर पाई है। अब शासन के निर्देश पर इन गांवों का नए सिरे से सर्वे किया जा रहा है।
आपदा के लिहाज से संवेदनशील गांवों को तीन श्रेणियों अतिसंवेदनशील, संवेदनशील और कम संवेदनशील श्रेणियों में बांटा गया है। आपदा प्रबंधन विभाग के अफसरों की मानें तो अब तक 69 गांवों को अतिसंवेदनशील चिह्नित किया गया है। इन ग्रामीणों के विस्थापन और पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को करीब 10 हजार करोड़ रुपये की दरकार है।