केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र प्रधान का उत्तराखंड से जुड़ाव काफी पुराना है। 2012 के विधानसभा चुनाव में वे पार्टी के सह चुनाव प्रभारी थे। इस नाते चुनाव अभियान की कमान सीधे उनके हाथ में थी। उस समय पार्टी ने सात विधायकों का टिकट काटा था और इन सातों सीटों पर पार्टी चुनाव हार गई थी। जब चुनाव नतीजे आए तो भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले एक सीट कम मिली थी।
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‘खंडूड़ी हैं जरूरी...’ के नारे पर भाजपा यह चुनाव लड़ी थी, लेकिन खंडूड़ी खुद चुनाव हार गए। पार्टी ने अब 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के साथ प्रदेश चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी है। इसी से तय हो गया है कि इस बार भी प्रधान भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होंगे।
आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी की क्या रणनीति होगी? पार्टी किन मुद्दों को लेकर चुनाव में उतरेगी? 2012 के विधानसभा चुनाव से भाजपा ने क्या सबक लिया? इन सभी सवालों को लेकर अमर उजाला के मुख्य संवाददाता कृष्णेंदु कुमार ने धर्मेंद्र प्रधान से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश....
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'जनता के फैसले को स्वीकार किया जाना चाहिए'
भाजपा कार्यालय में पहुंचे बागी
- फोटो : AmarUjala
- 2012 के विधानसभा चुनावों में आप सह चुनाव प्रभारी थे। तब भाजपा एक सीट के अंतर से सत्ता से दूर कैसे रह गई थी?
- देखिए, राजनीति में जनता के फैसले को स्वीकार किया जाना चाहिए। 2012 में जनता ने जो फैसला दिया, हमने स्वीकार किया। नजदीक आकर भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाने का कोई मलाल तो नहीं है। पिछली बार हम पांच से छह सीट के मामूली अंतर से हार गए थे। अगर भाजपा इन सीटों को जीत गई होती तो आज प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। 2012 में हमारी कुछ कमियां थीं, जिसकी वजह से भाजपा के प्रत्याशी कई सीटों पर चुनाव हार गए। अब हम इन कमियों को दूर करके चुनावी मैदान में उतरेंगे। वैसे हर चुनाव चुनौती भरा होता है, लेकिन एक बात तय है कि इस बार पिछली बार की तरह कोई चूक नहीं होगी।
- 2012 के चुनावों में तो भाजपा ने ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ का नारा दिया था। इस बार कोई चेहरा घोषित नहीं किया है। क्या इस बार चेहरा जरूरी नहीं है?
- हर चुनाव की अलग रणनीति होती है। प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पार्टी द्वारा तय की जाएगी। इसमें सबका सहयोग लिया जाएगा। सबकी राय ली जाएगी। प्रदेश में पार्टी का चेहरा कौन होगा, इस बारे में पार्टी का संसदीय बोर्ड तय करेगा। चेहरा जरूरी है या नहीं, इस बात का फैसला भी पार्टी ही करेगी। कई राज्यों के चुनाव में भाजपा बिना किसी चेहरे के मैदान में उतरी है और जीती भी है।
- 18 मार्च के घटनाक्रम के बाद प्रदेश की राजनीति में काफी उथल-पुथल रही। कांग्रेस के कुछ विधायक भी टूट गए। इसके बाद भी भाजपा की सारी योजना धरी की धरी रह गई।
- 18 मार्च को उत्तराखंड विधानसभा में जो कुछ हुआ उससे भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा के प्रस्ताव के समर्थन में कांग्रेस के विधायकों का एक गुट खड़ा हो गया था। कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने विधायकों की भावनाओं को नहीं समझ पाया। वह नेतृत्व जमीनी हकीकत से कट जो गया है। ऐसा सिर्फ उत्तराखंड में ही नहीं हुआ। अरुणाचल प्रदेश में क्या हुआ? पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस दो फाड़ हो गई। हम प्रतिद्वंद्वी पार्टी हैं, अगर उनके घर में झगड़ा होगा तो हम चुप तो बैठे नहीं रहेंगे। इस घटनाक्रम को लेकर राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष का क्या फैसला रहा, मैं इसकी तह में नहीं जाना चाहता हूं। पूरा मामला कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जुड़ा था।
- इस घटना के बाद कांग्रेस के नौ विधायक भाजपा के खेमे मेें आ गए। लेकिन इनको टिकट दिए जाने की संभावना को लेकर पार्टी में विरोध के स्वर उठ रहे हैं।
- नौ विधायकों की बात छोड़िए, अभी और लोग भी आने वाले हैं। इनको लेकर कहीं भी कोई विरोध का स्वर नहीं है। इससे तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। भाजपा एक अनुशासित पार्टी है। पार्टी जिस किसी को भी टिकट देती है उसके बाद पूरा संगठन उसकी मदद करता है। भाजपा के सभी लोग एकजुट हैं। जहां तक टिकट की बात है, जो भी जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवार होगा, उसे ही टिकट मिलेगा।
- पार्टी ने अपना कोई चेहरा घोषित नहीं किया है। ऐसे में पार्टी मुख्यमंत्री हरीश रावत को किस तरह घेरेगी?
- कांग्रेस का तो जहाज डूबने वाला है, बस एक आखिरी धक्के की जरूरत है। हरीश रावत के पांव के नीचे से जमीन खिसक चुकी है। इस हकीकत का उनको भी पता है। इसी हकीकत को छुपाने के लिए वे अनाप शनाप बोल रहे हैं। कभी कहते हैं कि किसी को जीतने नहीं दूंगा, कभी कहते हैं कि भाजपा कांग्रेस में तोड़फोड़ मचा रही है। हरीश रावत के नेतृत्व वाली सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर है। जनता ने जिस उम्मीद के साथ कांग्रेस को मौका दिया था उसको पूरा करने में सरकार विफल रही है। इन्हीं सब बातों को लेकर पार्टी मुख्यमंत्री को घेरेगी।
- रुड़की प्रदेश कार्यसमिति की मीटिंग में कोश्यारी और खंडूड़ी ने कई सवाल उठाए थे। उनके सवाल वाजिब भी थे। पार्टी इसका हल कैसे निकालेगी?
- हमारे तीनों पूर्व मुख्यमंत्री पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। पार्टी उनके राजनीतिक अनुभव और सुझावों से लाभ लेने की कोशिश करेगी। भाजपा के तीनों पूर्व मुख्यमंत्री पार्टी के राजनीतिक अभियान का नेतृत्व करेंगे। जहां तक सुझाव और सवाल की बात है तो पार्टी का कोई भी नेता पार्टी के मंच पर अपनी बात कह सकता है। कई ऐसी बातें होती हैं जिनकी चर्चा पार्टी के मंच पर ही अच्छी लगती है। समस्या की कोई बात नहीं, पार्टी में कहीं कोई मतभेद नहीं है।
- भाजपा की परिवर्तन यात्रा शुरू होने वाली है। इस यात्रा का उद्देश्य आप क्या मानते हैं?
- पूरे प्रदेश में परिवर्तन की लहर चल रही है। परिवर्तन यात्रा भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा का संवाद कार्यक्रम है। पार्टी कार्यकर्ता हर विधानसभा क्षेत्र में गांव-गांव जाकर लोगों को प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार से अवगत कराएंगे। इस अभियान में पार्टी के कई बड़े नेता भाग लेंगे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तीन जगह जनसभाओं को संबोधित करेंगे। कई जगह पर मैं खुद भी मौजूद रहूंगा। परिवर्तन यात्रा कांग्रेस के ताबूत में भाजपा की अंतिम कील साबित होगी।
- आपके पास प्रदेश चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी है। चुनावों को लेकर आपकी क्या रणनीति होगी। किन मुद्दों को लेकर भाजपा जनता के बीच में जाएगी ?
- दो राजनीतिक मुद्दे हैं जिनको लेकर हम जनता के बीच में जाएंगे। उत्तराखंड का गठन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। उत्तराखंड के लोग बहुत ही सरल हैं। पार्टी लोगों को बताएगी कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद उत्तराखंड के हित में कौन-कौन से फैसले लिए गए। वन रैंक, वन पेंशन, उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, फसल बीमा योजना सहित अन्य कई ऐसी योजनाएं हैं, जिसका लाभ प्रदेश के लोगों को मिला। दूसरा मुद्दा होगा प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार का। पार्टी प्रदेश के लोगों को बताएगी कि किस तरह यहां भय और भ्रष्टाचार का माहौल बनाया गया।