उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में सक्रिय वन माफिया और वन्य जीव तस्करों के मकड़जाल के संजाल की भनक पाने में नाकाम वन विभाग अब निजी जासूसों की मदद ले रहा है।
जासूसों को भुगतान सीक्रेट फंड से किया जाएगा। इस फंड में अभी 10 लाख रुपये जमा हैं। प्राइवेट जासूस अपनी रिपोर्ट आला अफसरों को ही देंगे। इसके बारे में दूसरे अधिकारियों को कुछ पता नहीं रहेगा। इन जासूसों को वन प्रभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी नहीं पहचान पाएंगे।
वन विभाग के आला अधिकारियों को वन क्षेत्रों से जो गुप्त सूचनाएं मिल रही हैं, उनके संबंध में जब प्रभाग के अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जाती है तो वे स्थिति सामान्य होने की रिपोर्ट दे देते हैं। इससे अपराधियों के खिलाफ कोई रणनीति नहीं बनाई जा पा रही। इसके अलावा उत्तराखंड में अंतरराष्ट्रीय वन्य जीव तस्करों के लगातार जड़ जमाने और आक्रामक होने से नेशनल वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल की नींद उड़ी हुई है।
तस्करों पर अंकुश लगाने के लिए वन, पुलिस, आईटीबीपी, ईडी समेत कई विभागों की संयुक्त टीम सफल नहीं हो पा रही। तस्करों के नए हाईटेक गिरोहों की सक्रियता स्थिति बिगाड़ रही है। वन्य जीवों के शिकार के लिए तस्कर नए हथकंडे अपना रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पलायन से जो गांव खाली हो गए, वहां तस्करों ने अड्डे बनाए हैं।
यहीं से अवैध शिकार की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। तस्करों के गुर्गे बर्तन, बिंदी बेचने के बहाने क्षेत्रों में रेकी करते हैं। स्थिति से निपटने के लिए वन विभाग निजी जासूसों की मदद ले रहा है। प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) दिग्विजय सिंह खाती ने बताया कि गुप्त सूचना देने वाले को सीक्रेट फंड से भुगतान की व्यवस्था है।