अंग्रेजों के लिए थी खुशखबरी
पहली बार 1946 में यहां की पत्तियों को लंदन के दलालों को भेजा गया जो कि चाय का कारोबार दूसरे देशों में करते थे। उन्होंने जब चाय को पकाकर इसकी गुणवत्ता को परखा तो रिपोर्ट भेजी की देहरादून की चाय में चीन की चाय जैसा उससे भी बेहतर स्वाद है। हालांकि, उन्होंने इसकी गंध को अच्छा लेकिन सुगंध को थोड़ा कमजोर बताया था। यह अंग्रेजों के लिए एक खुशखबरी थी क्योंकि उस वक्त यह माना जा रहा था कि देहरादून की चाय असम और बंगाल की चाय से मुकाबला नहीं कर पाएगी। इसका एक कारण यह भी था कि ये दोनों क्षेत्र उस वक्त के सबसे बड़े बाजार कलकत्ता (अब कोलकाता) के बेहद करीब थे। वहीं से ज्यादातर विदेशी कारोबार होता था। इसके बाद वर्ष 1951 में एक अफसर जो कि चाय की खेती को देखने के लिए चीन में नियुक्त किया गया था ने यहां के पौधों को कमजोर बताया। हालांकि, एक बार फिर लंदन को इसके नमूने भेजे गए जिन्होंने फिर से यही पुष्टि की कि देहरादून की चाय अव्वल है और चीन की चाय के बराबर कई मामलों में उससे भी अधिक है।
1881 में शिखर पर पहुंच गया था उत्पादन
इन परिणामों के चलते देहरादून चाय बाजार जैसे गदगद हो गया। 1863 में चाय बागान का क्षेत्रफल 1700 एकड़ पहुंच गया। यह अगले 10 वर्षों में 2000 एकड़ को पार कर गया जिनसे 2.07 लाख पाउंड पत्तियों का उत्पादन होने लगा। वर्ष 1872 में ही यहां के चाय बागानों को कुल 20 हजार पौंड में नाहन के राजा को बेच दिया गया। अंग्रेजी शासन की निगरानी में उत्पादन जारी रहा और 1881 में यह अपने शिखर पर पहुंच गया। यहां 4.4 हजार एकड़ में चाय के बागान हुए जिनकी संख्या 87 पहुंच गई। इनसे लगभग साढ़े आठ लाख पाउंड चाय पत्तियों का उत्पादन होने लगा।
दून की ग्रीन टी ने 1872 में बनाई पहचान
देहरादून के चाय बागानों से उस वक्त तक केवल काली चाय का उत्पादन होता था। 1872 में यहां ग्रीन टी बनाई जाने लगी जिसकी प्रक्रिया काली चाय बनाने से थोड़ी अलग थी। इसमें 40-40 मिनट तक गर्म करने, सुखाने और अन्य प्रक्रियाएं शामिल थीं। इस चाय को काबुल और मध्य एशिया तक पहुंचाया जाने लगा। उस वक्त जब चीन अपनी चाय को लगभग 10 आना प्रति पाउंड बेचता था देहरादून की ग्रीन टी 13 आना प्रति पाउंड तक बिकने लगी थी। यह सब लगभग 30 वर्षों तक चला और यहां के चाय बागान के मालिकों की पौ बारह होने लगी।
1907 में चीन की चाय पर शुल्क समाप्ति से धड़ाम हुआ बाजार
चीन उस वक्त और आज भी चाय बाजार का बादशाह रहा है। वर्ष 1907 में भारत का चाय बाजार एक बड़ी गिरावट के दौर में आ गया। इसका कारण भी चीन ही बना। उस वक्त भारत और मध्य एशिया के देश चीन की चाय पर शुल्क (टैरिफ) लगाया करते थे। वर्ष 1907 में यह टैरिफ हटा दिया गया जिससे चीन से चाय का आयात सस्ता होने लगा। देहरादून की जो चाय 13 आना प्रति पाउंड बिकती थी वह आठ आना और इससे भी कम आ गई। धीरे-धीरे उत्पादन गिरने लगा। कुछ छोटे चाय बागान तो बंद ही कर दिए गए।
युवाओं की पहली पसंद बनी स्पेशल टी
युवाओं में अब नई-नई तरह की चाय का स्वाद लेने का ट्रेंड बढ़ रहा है। कॉलेज-स्कूल के छात्र और ऑफिस जाने वाले लोग अब दोस्तों के साथ कैफे में बैठकर चाय के साथ बातचीत करना पसंद कर रहे हैं। इससे चाय सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि सोशल एक्सपीरियंस बन चुकी है।
ये भी पढे़ं...Uttarakhand: मुख्य सचिव ने की उच्चस्तरीय बैठक, चारधाम यात्रा, हीट वेव और मानसून तैयारियों को लेकर दिए निर्देश
रोजगार के नए अवसर भी बढ़े
चाय के इस हाई-फाई रूप ने रोजगार के नए दरवाजे भी खोले हैं। शहर में कई युवाओं ने टी-स्टार्टअप भी शुरू किया है। छोटे-छोटे टी कैफे और फ्रेंचाइजी मॉडल के जरिये लोग अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उधर, भले चाय ने आधुनिक रूप ले लिया है लेकिन आज भी अदरक-इलायची वाली पारंपरिक चाय का स्वाद लोगों के दिलों में बसा हुआ है। सुबह की शुरुआत और शाम की थकान मिटाने के लिए आज भी वही देसी चाय सबसे ज्यादा पसंद की जाती है।