शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया कि द सैनिक सहकारी आवास समिति 1964 में रजिस्टर्ड हुई थी। उस वक्त यह जमीन केंद्र सरकार के अनुदान से खरीदी गई थी। इसमें सिर्फ सैन्य सेवाओं से सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों और कर्मचारियों को ही प्लॉट बेचे जाने थे।
समिति रजिस्टर्ड कराने के बाद यहां पर प्लॉटिंग की। इसके साथ में यहां पर पार्क और अन्य सामुदायिक स्थानों के लिए जमीनों को खाली छोड़ा गया। समय-समय पर प्लॉट बिकते गए। लेकिन, इस बीच पिछले दिनों पता चला कि यहां पर समिति के पदाधिकारियों ने कालांतर में इन खुली जमीनों पर भी प्लॉट तराशकर उन्हें मनमाने दामों पर बेच दिया है।
यही नहीं बहुत से ऐसे लोगों को भी जमीनें बेची गईं जिनका सैन्य सेवाओं से कभी कोई ताल्लुक नहीं रहा। ऐसे में इन सभी ने नियम विरुद्ध काम करते हुए अनुचित लाभ कमाया और सरकार व समिति के सदस्यों को धोखे में रखा। एसओ संजीत कुमार ने बताया कि मामले में जांच की जा रही है।