हालांकि उस समय साक्ष्य के तौर पर केवल फैक्स ही था। कहना मुश्किल था कि पत्र में लिखे गए शब्द सच हैं या झूठ। इसीलिए अमर उजाला टीम ने फैक्स की सच्चाई जानने का फैसला किया। सच को उजागर करने में अमर उजाला को काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। आलोचना भी हुई और समर्थन भी मिला। तत्कालीन कांग्रेस सरकार एक बार तो जांच तक कराने को तैयार नहीं थी। अफसरों के इनपुट के बाद तत्कालीन एसएसपी सदानंद दाते और एसपी सिटी अजय सिंह की अगुवाई में एसआईटी गठित हुई।
एसआईटी ने ईमानदारी से जांच की तो सच सामने आता चला गया। एक-एक कर साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़कर एसआईटी केंद्र अधीक्षिका समेत तमाम आरोपियाें को जेल के सीखचों के पीछे पहुंचा दिया गया। अदालत में मूक बधिर संवासिनी के भ्रूण और दुष्कर्मी का डीएनए मिलान बड़ा साक्ष्य बना। शुक्रवार को अदालत ने संवासिनी से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के नौ आरोपियों को दोषी करार दिया। यह संभव हो पाया गुमनाम पत्र भेजने वाले शख्स की वजह से।
नारी निकेतन में हुए इस मामले में खोजी रिपोर्टिंग के लिए अमर उजाला को केसीके कुलिश अवार्ड मिला था। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अमर उजाला टीम को यह अवार्ड देकर सम्मानित किया था।
अमर उजाला की मुहिम के चलते नारी निकेतन का सच सामने आ सका। साक्ष्यों को मिटाने की भरसक कोशिश हुई, लेकिन एसआईटी के टीम वर्क ने पूरी साजिश को तार-तार कर दिया। शुरूआत में एसआईटी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पीड़ित संवासिनी का पता लगाने की थी, क्योंकि मूक बधिर होने के कारण पीड़ित अपना दर्द साझा नहीं कर सकती है। पीड़ित संवासिनी को एक बार तो एसआईटी के सामने नहीं लाया गया। नारी निकेतन के सूत्रों से जानकारी मिलने के बाद सख्ती बरती गई तो संवासिनी की पहचान हुई। मेडिकल आधार पर गर्भपात की पुष्टि हुई। परिस्थितिजनक साक्ष्यों के साथ वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए गए। इसका सुखद नतीजा आज सबके सामने है।
- सदानंद दाते, तत्कालीन एसआईटी प्रभारी