अभी तक यह मामला सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही तक सीमित माना जा रहा था। इसी के चलते प्रशासन ने दो लेखपालों को निलंबित भी कर दिया है लेकिन अब पुलिस की पूछताछ में बिचौलिया भी इस खेल के केंद्र में आया है। धीरज ने बिचौलिया का नाम लिया है। ऐसे में जब उसने सेटिंग की बात की तो इसके साफ संकेत मिल रहे हैं कि यह फर्जीवाड़ा एक सोची समझी साजिश के तहत किया गया है।
पुलिस पूछताछ में धीरज श्रीवास्तव ने बताया है कि रूपेश ने जब उससे दाखिलों के संबंध में बात की तो उसने भी अपने एक साथी से आगे बात की। इसके बाद उसके साथी ने भी एक व्यक्ति का नाम लिया। उसने बताया कि उसका एक साथी है जो देहरादून की कचहरी में अच्छी खासी पैठ रखता है। उसकी बड़ी सेटिंग है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह सरकारी आदमी नहीं बल्कि कोई निजी व्यक्ति है। ऐसे में षड्यंत्र के बात को यहां और भी ज्यादा बल मिलता है। बल इस बात से कि जब बात सेटिंग की है तो किसी न किसी अफसर या कर्मचारी से तो बात जरूरी की गई होगी। आवेदन ऑनलाइन किया जाएगा उसका सत्यापन भी होगा। सत्यापन किस तरह से और किन चीजों से बचकर करना है यह सब बातें तय हुई होंगी।
तभी प्रमाणपत्र मिलेगा। इसमें न सिर्फ शुरुआती कड़ी लेखपाल बल्कि एसडीएम के डिजिटल सिग्नेचर करने वाले डाटा एंट्री ऑपरेटर तक शामिल हो सकते हैं। बता दें कि प्रशासन की जांच समिति की संस्तुति के आधार पर दो लेखपालों को लापरवाही के चलते निलंबित कर दिया गया है। लापरवाही और षड्यंत्र भले ही छोटे कर्मचारियों ने किया हो लेकिन आंच इस मामले में बड़े अफसरों पर भी आ सकती है। इसका कारण है कि अंत में तो अफसरों के डिजिटल सिग्नेचर पर ही प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। ऐसे में देखने वाली बात यह है कि जांच की आंच से अफसर कब तक बचे रहेंगे या फिर आंच वहां तक पहुंचेगी भी या नहीं।
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दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों को भी हटाया
प्रशासन की संयुक्त जांच समिति ने दो लेखपालों और दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की थी। लेखपालों पर कुछ दिन पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है। जबकि दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों को भी सदर एसडीएम ने काम से बाहर कर दिया है। ये दोनों डाटा एंट्री ऑपरेटर एसडीएम सदर की डीएससी यानी डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट का काम देख रहे थे। एसडीएम सदर डॉ. अपूर्वा सिंह ने बताया कि दोनों से फिलहाल काम नहीं लिया जा रहा है।