हेल्दी खाने के नाम पर आपके साथ छलावा हो रहा है। जिन शुगर फ्री बिस्किट को हम शौक से खाते हैं वे भी शक के घेरे में हैं। द लैंसेट में प्रकाशित शोध में आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुब्बाराव एम गवरकर ने पैकेज्ड और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों को नियंत्रित करने के लिए एक नए दोहरे पैमाने वाले वर्गीकरण का सुझाव दिया है।
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इसके तहत किसी भी खाद्य पदार्थ की जांच दो आधारों पर होगी। पहला उसमें प्रोसेसिंग (बनावट में बदलाव और केमिकल) का स्तर कितना है और दूसरा उसमें फैट, चीनी व नमक की मात्रा कितनी है।
पीआईबी देहरादून के पत्रकारों के दल से बातचीत में हैदराबाद स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सुब्बाराव ने आगाह किया है कि आज बाजार में शुगर फ्री बिस्किट, फ्लेवर्ड दही, प्रोटीन बार, मल्टीग्रेन स्नैक्स और प्लांट-बेस्ड दूध जैसे उत्पादों को हेल्दी बताकर बेचा जा रहा है।
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इनमें भले ही चीनी या फैट कम होने का दावा किया जाए लेकिन इन्हें बनाने में कई तरह के इमल्सीफायर, स्टेबलाइजर और कृत्रिम मिठास का इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार ये भी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड श्रेणी में आते हैं। स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।
फैट, चीनी, रिफाइंड आटा और नमक की मात्रा बहुत अधिक
डॉ. सुब्बाराव के मुताबिक, भारत की स्थिति अलग है। यहां समोसा, चाट और जलेबी जैसी चीजें फैक्टरियों में अत्यधिक प्रोसेस नहीं की जातीं लेकिन फिर भी इनमें फैट, चीनी, रिफाइंड आटा और नमक की मात्रा बहुत अधिक होती है।
घरों में भी अब पैकेटबंद ग्रेवी, नूडल्स और रेडीमेड मसालों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को निर्देश दिया था कि वह पैकेट के आगे अनिवार्य चेतावनी लेबल लगाने पर पुनर्विचार करे।
शहर से गांवों तक तेजी से बढ़ रहा पैकेट खाना
डॉ. सुब्बाराव ने बताया कि आंकड़ों के हिसाब से देश में खानपान की आदतें तेजी से बिगड़ रही हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 15 से 49 आयु वर्ग के पुरुषों में मोटापा 23 से बढ़कर 27 प्रतिशत और महिलाओं में 24 से बढ़कर 31 प्रतिशत पर पहुंच गया है।
हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे दर्शाता है कि 2011-12 से 2023-24 के बीच ग्रामीण इलाकों में पैकेटबंद खानपान पर मासिक खर्च 7.9 से बढ़कर 9.8 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 9 से बढ़कर 11.1 प्रतिशत हो गया है।
आर्थिक सर्वेक्षण और आईसीएमआर के अध्ययनों ने अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा कैलोरी वाले खान-पान को मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी गंभीर बीमारियों का मुख्य कारण माना है।