भाजपा और कांग्रेस की विचारधारा बेशक अलग हो, लेकिन सत्ता में आने के बाद दोनों दलों के काम का तरीका एक जैसा है कि ‘कर्ज उठाओ और सरकार चलाओ।’
उत्तराखंड सरकार के वित्तीय विवरण में दर्ज आंकड़े इस बात तस्दीक करते हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से जो तस्वीर उभर कर सामने आती है, वह बताती है कि पिछले 15 वर्षों में सरकार पर 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज हो चुका है और समय से साथ सरकार पर कर्ज के ब्याज और उसकी वापसी का दबाव बढ़ रहा है।
कर्ज के मामले में सरकारों का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं है। आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2016-17 के दौरान कुल चार सरकारें सत्ता पर काबिज रही और हर सरकार ने अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज का सहारा लिया। उत्तराखंड राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम के तहत कर्ज का इस्तेमाल उत्पादक खर्च में होना चाहिए ताकि विकास की गति को बढ़ाया जा सके। चिंताजनक तथ्य यह है कि बाजार से उठाई कर्ज की बड़ी राशि का इस्तेमाल वेतन, भत्तों एवं पेंशन सरीखे अनुत्पादक खर्च को पूरा करने में किया गया।
मजेदार बात यह है कि विपक्ष में आने के बाद सियासी दल कर्ज को सियासी मुद्दा बनाते हैं। इस दफा बारी कांग्रेस की है। सरकार द्वारा उठाए जाने वाला यह कर्ज बड़ा सियासी मुद्दा बनता है। इस मुद्दे को लेकर कभी भाजपा मुखर थी। आज मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस तेवर दिखा रही है और उसने गैरसैंण में बजट सत्र के दौरान इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है। सरकार का तर्क है कि भारत सरकार की तय सीमा पर ही कर्ज उठाया जा रहा है।
कब किस सरकार ने कितना लिया कर्ज
कार्यकाल अवधि - सरकार- कर्ज(करोड़ में)
2002-2007- कांग्रेस - 6476.95
2007-2012- भाजपा - 10,536.33
2012-217- कांग्रेस - 23,074.59
2017-18- भाजपा- 5700.00
-6660 करोड़ रुपये एक साल में कर्ज लेने की लिमिट
-5700 करोड़ रुपये का कर्ज फरवरी तक ले चुकी सरकार
-6000 करोड़ पार पहुंच सकता है कर्ज उठाने का आंकड़ा
-30 हजार करोड़ हो जाएगा कर्ज, इसी दर से हर साल लिया तो
भारत सरकार ने कर्ज की सीमा तय की है। इस वित्तीय वर्ष के लिए यह सीमा करीब 6600 करोड़ रुपये की है। इसी सीमा के भीतर प्रदेश सरकार ने कर्ज लिया है। हमारी कोशिश है कि अपने संसाधनों से आय बढ़ाई जाए। इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
- प्रकाश पंत, वित्त मंत्री
हमारा एतराज कर्ज उठाने को लेकर नहीं है। एतराज वेतन एवं भत्तों की अदायगी के लिए कर्ज उठाने पर है। कर्ज का इस्तेमाल विकास योजनाओं पर होना चाहिए न कि तन्ख्वाहों पर। लेकिन प्रदेश सरकार का वित्तीय प्रबंधन गड़बड़ा गया है। विकास कार्य पूरी तरह से ठप हैं। जीएसटी से आय कम हो गई है।
- प्रीतम सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
रिजर्व बैंक के निर्धारित मानकों के हिसाब से यदि कर्ज ले रहे हैं तो उसमें बुराई नहीं है। बशर्ते इसका इस्तेमाल विकास कार्यों के लिए हो। लेकिन सरकार वेतन देने के लिए कर्ज ले रही है। हमने भी कर्ज लिया लेकिन उसे उत्पादक कार्यों में लगाया। हमारी सरकार की तुलना में भाजपा सरकार की राजस्व प्राप्तियां कम हो गई। दिल्ली से कम पैसा आ रहा है। सरकार के अपने संसाधनों में भारी कमी आई है।
- हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री