केदारनाथ पैदल मार्ग पर चीरवासा में सिर्फ 100 मीटर के दायरे में कई नर कंकाल मिलने के बाद सर्च अभियानों पर सवालिया निशान लगने लगे हैं।
आपदा के दौरान केदारघाटी के जंगलों में रेस्क्यू आपरेशन ढंग से चलाया गया होता तो कई लोगों की जान बच सकती थी।
यदि ऐसा भी नहीं हो पाया, तो कम से कम भूख-प्यास और हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान कम होना) से मृत लोगों के शव ढूंढे जा सकते थे।
नरकंकाल मिलने से सरकार के दावों की हवा निकली
पिछले चार दिनों में पैदल मार्ग के नजदीक खुले में नर कंकाल और शव बरामद होने के बाद सरकार के उन दावों की हवा निकल गई है जिसमें पिछले कांबिग के बाद कहा गया था कि अब खुले में कोई शव नहीं है।
पिछले वर्ष की आपदा के बाद के पूरे घटनाक्रम पर नजर डाले, तो हर कदम पर भारी चूक दिखाई देती है। 16 जून से पैदल मार्ग पर तेज बारिश शुरू हो गई थी।
मंदाकिनी नदी और पैदल मार्ग पर गदेरों के उफान पर होने से लोग पैदल मार्ग छोड़ जंगलों की ओर जान बचाने भागने लगे। बारिश से बचने के लिए लोग जंगल में पत्थर की ओट और झाड़ियों में घुस गए।
रेस्क्यू में छोड़ दिया इन इलाकों को
17 जून को भी बारिश लगातार होती रही। 18 जून को जब सेना और पुलिस का रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ तो इन स्थानों की ओर ध्यान नहीं दिया गया।
गौरीकुंड से करीब साढे़ तीन किमी ऊपर चीरवासा में जहां शव मिल रहे हैं, वहां तक पहुंचना प्रशिक्षित बचाव दल के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है।
11 जून को जहां शव मिले, वह स्थान भी चीरवासा के निकट मार्ग से 100 मीटर ऊपर था। अब जहां शव मिल रहे हैं, वह भी 100 मीटर ही है। इन शवों को खोजने में भी पुलिस की कोई भूमिका नहीं रही है। ऐसा स्थानीय लोग बताते हैं।
100 मीटर की दूरी पर पड़े मिले शव
यदि कांबिंग करने वाले दलों ने पैदल मार्ग के दोनों ओर 50 से 100 मीटर में तलाशी अभियान चलाया होता, तो यह शव जरूर नजर आते।
हद की बात तो यह है कि 11 जून को पांच नर कंकालों के दाह संस्कार के बाद भी पुलिस ने यहां तलाशी अभियान नहीं चलाया क्योंकि अब जहां शव मिल रहे हैं, उसकी दूरी लगभग 400 मीटर है।
वहीं, पुलिस अधीक्षक बीजे सिंह का कहना है कि पैदल मार्ग पर ऐसे जंगल हैं, जहां 50 मीटर अंदर घुसने पर आदमी जंगल में भटक सकता है। जहां शव मिल रहे हैं वहां कोई रास्ता भी नहीं है। सामान्य तौर पर यह नजर नहीं जाती है। लेकिन जहां-जहां शवों के मिलने की सूचना मिल रही है, वहां कांबिंग की जा रही है।