तीन दिन के विधानसभा सत्र के बाद भाजपा और कांग्रेस भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो लेकिन थोड़े फायदे के साथ दोनों को नुकसान भी झेलना पड़ा।
दैवी आपदा को लेकर हुई चर्चा पर जवाब नहीं दे पाने की स्थिति में स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल का विनिश्चय आना सरकार के फेलियर जैसी स्थिति रही। जबकि आपदा की चर्चा में ही सिमटी भाजपा के हाथ भी तीन दिन में कुछ खास नहीं लगा।
सबक लेने वाला रहा सत्र
तीन दिन का विधानसभा सत्र कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए सबक लेने वाला रहा। शह-मात के खेल में दोनों को ही जीत और हार दोनों नसीब हुए। हाउस तीन दिन चला और नतीजा सिफर।
जिस दैवी आपदा को लेकर विपक्ष ने 310 में दैवी आपदा पर चर्चा बाजी मारने की कोशिश की उसी पर ऐसा कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। तीन दिन तक यही पता नहीं चला कि यह चर्चा है या फिर ग्राह्यता पर सुनवाई चल रही है।
सड़क पर घेराव
राजनीतिक लाभ की दृष्टि से भाजपा ने सड़क पर घेराव कर काफी कुछ पाया लेकिन सदन में ज्यादा कुछ नहीं। इसी तरह से कांग्रेस ने चर्चा पर भाजपा को तीन दिनों तक उलझाकर भले ही राजनीतिक चातुर्य का प्रमाण दिया हो लेकिन उसके जवाब के स्थान पर स्पीकर का विनिश्चय आना सियासी तौर पर बड़ा नुकसान है।
भाजपा को नुकसान
: आपदा के एक ही मुद्दे पर तीन दिन खर्च कर डाले
: नियम 310 की चर्चा को भाषणबाजी से आगे नहीं बढ़ा पाए
: सदन के भीतर भाजपा विधानमंडल दल में धड़ेबाजी दिखी
फायदा
: गोलीकांड में कुंवर प्रणव को सरेंडर कराने में कामयाब रही
कांग्रेस को नुकसान
: विधायक ही नेता सदन की जगह विपक्ष के सवालों का जवाब देते रहे
: फ्लोर मैनेजमेंट कमजोर रहा, दैवी आपदा पर जवाब नहीं दे सकी
फायदा
: तीन दिन के हाउस में भाजपा को दैवी आपदा में ही उलझाए रखा
: चुपके से सप्लीमेंटरी बजट पास करा लिया
अन्य
: दैवी आपदा पर हुई चर्चा पर सरकार के जवाब केबजाय विधानसभाध्यक्ष का विनिश्चय आने से नई परंपरा की शुरूआत हुई