गांधी ग्राम, नई बस्ती में दुर्गा मंदिर के पास एक बेहद तंग गली का छोटा सा घर। यहां राजकीय बालिका इंटर कालेज लक्खीबाग में 12वीं पढ़ने वाली शिवानी अपनी छोटी बहन को बहलाती है-देख, मम्मी को तंग मत किया कर।
पापा जल्दी आ जाएंगे। फिर सब घूमने चलेंगे। छोटी बहन बहलावे में आ खेलने के लिए इधर घर से बाहर होती है, उधर शिवानी की आंखें भीग जाती हैं।
शिवानी बताती है-पापा विजय रस्तोगी मालिक के साथ एक माह के लिए केदारनाथ गए थे। मालिक का गुप्तकाशी में होटल है। वहां से 17 जून को उनका फोन आया था। पूछ रहे थे सब ठीक है या नहीं, लेकिन उसके बाद से उनका न कोई फोन आया, न खबर। कई बार मालिक से मम्मी ने पापा के बारे में पूछा। मालिक का भाई खुद आपदा में मारा गया, इसलिए वह बार-बार यही दोहरा रहे हैं कि पता लगते ही घर ले आऊंगा। अब तो कई बार फोन भी नहीं उठाते।
पापा की बहुत याद आती है
घर का खर्च कैसे चलता है? पूछने पर शिवानी बेहद मुश्किल में दिखाई देती है-मम्मी नीरू मोहब्बेवाला में एक कास्मेटिक की दुकान पर काम करती हैं। ढाई हजार रुपये के आस-पास उन्हें मिलता है। पापा की ही कमाई से घर चल रहा था और सिर झुका लेती है। पापा की बहुत याद आती है कहते हुए सिर उठाती है और साथ ही जोड़ देती है, उम्मीद है कि पापा लौटकर जरूर आएंगे...।
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