इसे अपलोड करने में भी मात्र दो सेकेंड का समय लगेगा। एसटीएफ की सीसीटीएनएस टीम पूरे कुमाऊं में एसएचओ और एसओ को साफ्टवेयर संचालन का प्रशिक्षण दे रही है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद हर थाने की पुलिस इसका इस्तेमाल करेगी।
इंसानी दिमाग की तरह करता है काम
यह सॉफ्टवेयर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तर्ज पर इंसानी दिमाग की तरह काम करता है। डीआईजी रिद्धिम अग्रवाल ने बताया कि यह सॉफ्टवेयर फेस फीचर को मैच कर रिजल्ट देता है। शारीरिक ढांचे से भी किसी की पहचान हो सकेगी। इसमें वाइस सैंपल रिकॉर्ड करने की सुविधा भी है।
एसएचओ और उससे ऊपर के अधिकारी करेंगे डाटा अपलोड
एसएचओ और उससे ऊपर के अधिकारी ही इस साफ्टवेयर में पांच साल तक के अपराधियों का डेटा अपलोड करेंगे। इसमें उन्हें अपराधियों का नाम, पता और फोटो अपलोड करना होगा। इसके बाद हर दरोगा के मोबाइल पर इसे लोड किया जाएगा। अभी तक एसटीएफ ने दस हजार अपराधियों का डाटा अपलोड किया है। अगले चार माह में करीब 40 हजार अपराधियों का डाटा तैयार हो जाएगा।
25 साल पुराने चेहरे की हुई पहचान
डीआईजी रिधिम अग्रवाल ने बताया कि सॉफ्टवेयर की जांच के लिए एसटीएफ के एक इंस्पेक्टर का वर्तमान फोटो सॉफ्टवेयर में अपलोड किया गया। फिर उसी इंस्पेक्टर के 25 साल पुराने बचपन के फोटो को लोड किया गया। तीन सेकिंड में ही सॉटवेयर ने बचपन के चेहरे की पहचान वर्तमान के चेहरे के रूप में की।
अपराधियों की पहचान के लिए प्रतिबिंब नाम से रिकग्नाइजेशन सॉफ्टवेयर जारी किया गया है। इसमें अपराधियों का डेटा अपलोड किया जा रहा है। डेटा लोड होने के बाद सभी थानों में इसका इस्तेमाल अपराधियों की पहचान और शवों की शिनाख्त के लिए होगा।
- रिद्धिम अग्रवाल, डीआईजी, एसटीएफ