देहरादून के बहुचर्चित दारोगा भर्ती घोटाले में 11 साल तक जांच करने के बाद सीबीआई भी ‘दो अंकों’ का रहस्य नहीं सुलझा पाई।
253 दारोगाओं की इस भर्ती में हुआ घोटाला
आरोपी अधिकारियों ने 253 दारोगाओं की इस भर्ती में दो अभ्यर्थियों के सिर्फ दो-दो अंक बढ़ाए थे जबकि उनको भी मालूम था कि करीब पांच सौ से ऊपर अंक पाने वाले सामान्य अभ्यर्थी ही चयनित हो पायेंगे। इन दोनों का भी चयन नहीं हुआ।
सवाल यह उठता है कि आखिर इतने कम अंकों के लिए फेरबदल की कवायद क्यों की गई। सीबीआई के पास न इसका जवाब है न ही वह इन अभ्यर्थियों के खिलाफ कोई साक्ष्य जुटा पाई है। पहले हुई पुलिस जांच में भी इसका खुलासा नहीं हो पाया था।
2002-03 में प्रदेश में सिविल पुलिस, पीएसी और इंटेलिजेंस के 253 सब इंस्पेक्टरों की भर्ती परीक्षा हुई थी। बाद में आरोप लगे कि लिखित परीक्षा के अंकों में फेरबदल कर अपात्र चहेते अभ्यर्थियों के अंकों को बढ़ा दिया गया है और पात्र अभ्यर्थियों के अंकों को कम किया गया।
2003 में इस मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद तत्कालीन पुलिस उप महानिरीक्षक (कार्मिक) अजय कुमार ने अगस्त, 2004 में अपर पुलिस अधीक्षक मुख्यालय सतीश कुमार शुक्ला के सहयोग से पूरे प्रकरण की विभागीय जांच कर पुलिस महानिदेशक को जांच रिपोर्ट सौंपी।
इसमें वीरेंद्र सिंह और रामवीर सिंह के दो-दो अंक बढ़ाए जाने का मामला सामने आया। वीरेंद्र सिंह ने लिखित परीक्षा और इंटरव्यू में कुल 444 अंक हासिल किए थे, जिसे बढ़ाकर 446 किया गया। रामवीर सिंह को 412 अंक मिले थे, जिसे बढ़ाकर 414 किया गया। इसके बाद भी इन दोनों का चयन नहीं हुआ।
न तो पुलिस जांच में इन अभ्यर्थियों के खिलाफ कोई साक्ष्य मिला न ही सीबीआई इनके खिलाफ कोई साक्ष्य जुटा पाई है। सीबीआई भी यह नहीं बता पाई कि इन दोनों के दो-दो अंक क्यों बढ़ाए गए जबकि उन्हें इसका लाभ ही नहीं मिलना था। चार्जशीट में भी सीबीआई ने अधिकतर वे ही तथ्य पेश किए हैं जो पुलिस जांच में पहले ही सामने आ चुके थे।
28 अक्तूबर से शुरू होगी गवाही
सीबीआई की विशेष अदालत में 28 अक्तूबर से दारोगा भर्ती घोटाले में गवाही शुरू हो जाएगी। सीबीआई ने इस प्रकरण में 54 गवाह बनाए हैं।