जेल में बंद और निलंबित अपर सचिव जेपी जोशी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को फटकार लगाई है। अदालत का कहना है कि प्रदेश सरकार ने जोशी के खिलाफ एक लड़की की ओर से दर्ज कराए गए बलात्कार के मामले को गंभीरता से नहीं लिया। पीड़िता ने गत वर्ष दिल्ली में जीरो एफआईआर दर्ज कराई थी।
जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई व जस्टिस एनवी रमन्ना की पीठ ने राज्य सरकार से पूछा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और दिल्ली महिला आयोग में पीड़िता की ओर से की गई शिकायत का क्या हुआ?
कोर्ट ने जानना चाहा कि आयोगों ने क्या राज्य से कोई जवाब तलब किया है? अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए राज्य सरकार को दो सप्ताह का समय दिया है।
पीड़िता ने की केस दिल्ली ट्रांसफर करने की मांग
पीड़िता ने अदालत से मामले को दून से दिल्ली स्थानांतरित करने की गुहार लगाई है। इसी मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रदेश सरकार को लताड़ लगाई है।
अदालत ने मामले की सुनवाई पहली जुलाई को तय की थी लेकिन राज्य की ओर से किसी वकील के पेश नहीं होने की वजह से सुनवाई आगे बढ़ानी पड़ी। पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में राज्य सरकार का रवैया बेहद लचर है।
गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को मार्च में नोटिस जारी किया था। पीड़िता के खिलाफ जेपी जोशी ने देहरादून में एक एफआईआर दर्ज कराई है।
पीड़िता ने अपने ऊपर हुए जुल्म और प्रतिपक्ष की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमों को दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की है।
पीड़िता पर है केस वापस लेने का दबाव
जोशी के खिलाफ 22 नवंबर की शाम जीरो एफआईआर दर्ज होने के ठीक तीन घंटे बाद देहरादून में पीड़िता के खिलाफ मामला दर्ज करवाया गया।
पहले राज्य पुलिस के समक्ष पीड़िता की ओर से एफआईआर दर्ज कराने की कोशिशें बेकार रही थीं। जोशी ने पीड़िता के खिलाफ बदनाम करने की साजिश रचने की एफआईआर दर्ज करवाई थी।
पीड़िता की याचिका में कहा गया है कि राज्य पुलिस पीड़िता को आरोपी बनाने पर तुली है। क्योंकि निलंबित अपर सचिव के नीचे तमाम पुलिस अधिकारी कार्य कर चुके हैं। ऐसे में पीड़िता को परेशान किया जा रहा है, ताकि वह बलात्कार का आरोप वापस ले ले।