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धोखाधड़ी के आरोपी दंपति को पांच साल की सश्रम कैद, 50 हजार जुर्माना

Wed, 19 Apr 2017 09:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, कोटद्वार
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अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भवदीप रावते की अदालत ने धोखाधड़ी के मामले में दोषी दंपति को पांच-पांच साल के सश्रम कारावास और 50-50 हजार रुपये के जुर्माने की सजा से दंडित किया है। जुर्माने की रकम अदा न करने पर दोनों को एक-एक साल का अतिरिक्त साधारण कारावास भोगना होगा। दंपति कोटद्वार के पदमपुर सुखरो में सीवी रमन इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी संस्थान चला रहे थे। उनके खिलाफ मेकेनिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश और अध्ययन के नाम पर छात्रों से लाखों रुपये हड़पने का मामला दर्ज किया गया था।
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सहायक अभियोजन अधिकारी अजीत कुमार मिश्रा ने बताया कि 27 सितंबर, 2012 को रमन सीवी रमन इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी के छात्र फैजखान ने कोटद्वार कोतवाली में अनिल परिहार पुत्र गंभीर सिंह और उनकी पत्नी मुक्ता परिहार (संस्थान के निदेशक और प्रिंसिपल) के खिलाफ एक तहरीर दी। छात्र फैजखान ने उससे और कई अन्य छात्रों से संस्थान में मैकेनिक और सिविल इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश और अध्ययन के नाम पर शिक्षण शुल्क और अन्य मदों में लाखों रुपये हड़पने का आरोप लगाया था। कहा कि संस्थान उनके मूल शैक्षिक दस्तावेज भी वापस नहीं करा रहा है। संस्थान में विभिन्न सेमेस्टरों में 340 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत बताए।

 सभी को प्रवेश के लिए काल लेटर जारी कर भरोसा दिया गया कि उनका संस्थान सभी सरकारी संस्थाओं से विधिवत मान्यता प्राप्त है। परीक्षाएं संपन्न होने पर अन्य संस्थाओं के नाम की फर्जी अंकतालिका उन्हें दी गई। उनसे 60-60 हजार रुपये का शुल्क अन्य मदों में लिया गया। तहरीर में कहा गया कि 21 सितंबर, 2012 को उन्हें अनिल परिहार और मुक्ता परिहार की नियत पर उस वक्त संदेह हुआ, जब उन्होंने सभी छात्र-छात्राओं से एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। छात्र-छात्राओं ने जब संस्थान के बारे में अधिकृत सरकारी संस्थाओं की वेबसाइट चेक की तो पता चला कि उनका संस्थान इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा से संबंधित किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय, संस्थान और परिषद से संबद्ध और मान्यता प्राप्त नहीं है। 
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अभियोजन पक्ष की ओर से इस मामले में पांच गवाह न्यायालय में पेश किए गए। विवेचना अधिकारी उपनिरीक्षक एमएमएस बिष्ट ने संस्थान की ओर से जारी काल लेटर, फीस की रसीद, मूल एडमिट कार्ड, एसडीएम कोटद्वार द्वारा की गई जांच की प्रति समेत कई दस्तावेज बतौर साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किए। अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें और पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर न्यायालय ने उनके कृत्य को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के अपराध में दोष सिद्ध पाया। 
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