डॉक्टर को बताया गया था कि छात्रा को इस महीने मासिक धर्म नहीं हुआ है। इस पर डॉक्टर ने उन्हें बताया था कि हार्मोंस की गड़बड़ी के कारण भी ऐसा हो जाता है, लिहाजा उन्होंने तीन गोलियां लिखकर दीं।
इसके बाद जब डॉक्टर को कुछ शक हुआ तो उन्होंने छात्रा का अल्ट्रासाउंड कराने के बाद सोमवार को आकर मिलने को कहा। जैसे ही उन्होंने यह बात कही तो वे दवा की पर्ची लेकर वहां से चले गए। डॉक्टर के अनुसार उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है, कि स्कूल वालों ने छात्रा को वह दवा खिलाई है या नहीं।
यदि खिलाते भी हैं तो इन दवाओं से कुछ नहीं होगा। डॉक्टर के अनुसार वे लोग अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट लेकर तो नहीं पहुंचे, लेकिन सोमवार को पुलिस जरूर पहुंच गई। यह देखकर वह घबरा गई और क्लीनिक छोड़कर चली गई थी।
गैंगरेप प्रकरण में सिस्टम की लाचारी भी सामने आई है। कभी किसी की अनुपस्थिति में तो कभी कोई और कारण बेवजह इस महत्वपूर्ण जांच में देरी की वजह बना हुआ है।
दरअसल, मामले में जल्द से जल्द मेडिकल कराया जा सके इसके लिए पुलिस रविवार को ही छात्रा का मेडिकल कराना चाहती थी। लेकिन, चिकित्सक के उपलब्ध न होने के कारण रविवार को मेडिकल नहीं कराया गया। इसी तरह मंगलवार को भी न्यायालय में भी मजिस्ट्रेटी बयान दर्ज नहीं कराए जा सके।
जबकि, ऐसे मामलों में जल्द से जल्द सारी कार्रवाई पूरी करने पर जोर होता है ताकि पीड़िता और उसके परिवार वालों पर कोई दबाव न बना सके। पिछले दिनों इसका एक उदाहरण प्रेमनगर में हुए गैंगरेप से समझा जा सकता है। पुलिस आरोपियों के स्टे आर्डर को रद्द कराने में ही उलझी रही तब तक पीड़िता ने अपने बयान ही बदल दिए। बताया जा रहा है कि उस पीड़िता पर भी दबाव बनाया गया था।
बाल आयोग के सदस्यों ने जब क्लीनिक की पड़ताल की तो वहां गंदगी पसरी हुई थी। इसके अलावा जो उपकरण भी पूरी तरह से साफ नहीं थे। डॉक्टर, बाल आयोग की सदस्यों से देर शाम मिली थीं। इससे पहले बुजुर्ग डॉक्टर घबराई हुई थीं और उनसे मिलने से बच रही थी। निरीक्षण बाल आयोग की अध्यक्षा ऊषा नेगी के नेतृत्व में किया गया था।
पहले धमकी दी, फिर ले गए क्लीनिक
स्कूल प्रबंधन के लोग छात्रा को क्लीनिक ले जाने से पहले राजपुर ब्रांच में ले गए थे। आरोप है कि वहां पर निदेशक ने छात्रा को धमकाया कि वह उसे आखिरी मौका दे रही है।
या तो गर्भपात करा लो नहीं तो उसे बदनाम कर स्कूल से निकाल दिया जाएगा। निदेशक ने कहा था कि उनका करोड़ों का काम है और उसे केवल एक छात्रा की वजह से बर्बाद नहीं होने देंगे। इसके बाद छात्रा मायूस होकर प्रबंधन के लोगों के साथ क्लीनिक चली गई।
बोर्डिंग स्कूल में गैंगरेप के आरोपी छात्रों पर शिकंजा कसने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने पर भी पुलिस का जोर रहेगा। पीड़िता का गर्भपात होने के बाद उसका डीएनए भी कराया जाएगा। ताकि, इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को पुलिस कोर्ट में प्रस्तुत कर आरोपियों को सजा दिला सके। हालांकि, अभी तक छात्रा का गर्भपात हुआ है या नहीं इसकी पुष्टि बुधवार को आने वाली मेडिकल रिपोर्ट में ही होगी।
बता दें कि दुराचार के कई मामलों में गवाहों के मुकरने और यहां तक कि पीड़ित पक्ष के मुकरने की बात भी सामने आई हैं। ऐसे में कई मुकदमों के फैसले आरोपियों के पक्ष में चले जाते हैं। लेकिन, यदि पुलिस के पास कोई वैज्ञानिक साक्ष्य होता है तो इसी के आधार पर दोषी सजा पाते हैं। फिर चाहे गवाहों की गवाही किसी के भी पक्ष में हो। चूंकि, यह मामला एक माह पुराना है तो फिलहाल पुलिस के पास मौका-ए-वारदात से संकलित वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है। अब छात्रा का अविकसित भ्रूण ही वैज्ञानिक साक्ष्य का एक ही आधार हो सकता है।
बताया जा रहा है कि छात्रा को रविवार को गर्भपात की दवा खिलाई गई थी। जानकारों के अनुसार यदि इन दवाओं से हाल ही में गर्भपात हुआ हो तब भी डीएनए के लिए सैंपलिंग हो जाएगी। ऐसे में सहसपुर पुलिस वैज्ञानिक साक्ष्यों के लिए डीएनए टेस्ट कराने को न्यायालय में प्रार्थनापत्र देगी। अधिवक्ता आरएस राघव ने बताया कि कानूनन भी ऐसे मामलों में नाबालिग लड़कियों का गर्भपात कराने का ही नियम है। इसके बाद भी पुलिस डीएनए सैंपलिंग कराने के बाद टेस्ट के लिए फोरेंसिक लैब भेज सकती है। इस डीएनए का आरोपियों के डीएनए फिंगर प्रिंट से मिलान आरोप साबित करने के लिए अकाट्य सुबूत होगा।