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...और वर्षों में बदल गया चंद पल का फासला

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रुद्रेश आर्य, देहरादून
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जीत लगभग मुठ्ठी में थी और ‘अगला कदम’ मंजिल पर पड़ने वाला था, मगर किस्मत को यह मंजूर नहीं था और चंद पल का फासला वर्षों के इंतजार में तब्दील हो गया। मन में टीस जरूर थी, लेकिन साथियों की जीत इससे कहीं ज्यादा थी। यह कहानी है एवरेस्ट फतह करने से महज चंद कदमों से चूके एएसपी नवनीत भुल्लर की। नवनीत को एवरेस्ट पहुंचने के लिए सिर्फ 180 मीटर चलना था। यह दूरी वह चंद घंटों में पूरा कर लेते, मगर ऑक्सीजन रेग्यूलेटर में आई कमी से उनके कदम ठिठक गए। जो चीज कुछ हजार रुपये की मिल जाती है, वह रास्ते में लाखों में भी नहीं मिल सकी।
दरअसल, एएसपी नवनीत भुल्लर 17 मई को बेस कैंप से एवरेस्ट रवाना होने वाले उत्तराखंड पुलिस के दूसरे दल के लीडर थे। वह सबसे आगे चल रहे थे। 20 मई की रात तक उन्होंने तकरीबन 98 फीसदी रास्ता तय कर लिया था। इसी बीच उनके ऑक्सीजन रेग्यूलेटर में कमी आ गई और गैस का रिसाव होने लगा। इस वजह से ऊपर चढ़ना खतरे से खाली नहीं था। भुल्लर बताते हैं कि उसी समय ऊपर से कुछ शेरपा (एवरेस्ट गाइड) लौट रहे थे। सुना था कि वे बिना ऑक्सीजन के भी बेस कैंप तक लौट जाते हैं। लिहाजा उन्होंने शेरपाओं से ऑक्सीजन रेग्यूलेटर मांगा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। शेरपाओं को पहले उन्होंने दस हजार ऑफर किए, मगर वे नहीं माने। रकम बढ़ाते-बढ़ाते वे डेढ़ लाख रुपये तक आ गए, लेकिन शेरपा ऑक्सीजन रेग्यूलेटर देने से इनकार करते रहे।
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भुल्लर ने बताया कि उस समय ध्यान आया कि अगर पहले से ही स्पेयर में ऑक्सीजन रेग्यूलेटर रख लिए जाते थे अच्छा होता। आम तौर पर रेग्यूलेटर बाजार में एक से तीन हजार रुपये तक मिल जाते हैं। इसी बीच बेस कैंप से आईजी साहब का निर्देश मिला कि यदि ऊपर जाने के लिए कुछ इंतजाम नहीं हो रहा तो वह बिना वक्त गंवाए वापस आ जाएं। उस समय एक पल के लिए बेहद दुख हुआ, लेकिन अपने साथियों में कुछ पहुंच चुके थे और कुछ पहुंचने वाले थे। इसी बात को लेकर मन में खुशी भी बहुत थी। अब शायद उनका यह फासला आने वाले कुछ वर्षों में ही पूरा हो सकेगा, जब कोई दूसरा अभियान चले।
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सिहरन थी और अजीब सा डर भी...
टीम का नेतृत्व करने वाले आईजी संजय कुमार गुंज्याल ने बताया कि अभियान पर जाने से पहले एक अजीब सी सिहरन थी। डर भी लग रहा था। सभी की जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी। पल-पल उन्हें गाइड भी कर रहा था और अपने वरिष्ठों की बातें भी हमेशा दिमाग में रहती थीं। जैसे ही हम बेस कैंप पहुंचे तो सब डर दूर हो गया। अब बस जीत दिख रही थी। इसी दौरान जब कुछ साथियों के साथ तकनीकी परेशानियों का पता चला तब कुछ घबराहट भी हुई, लेकिन सबसे जरूरी हमारा सुरक्षित लौटना था। इसी के चलते उन्हें वापस आने के निर्देश दिए। ये ईश्वर और प्रदेश की जनता का आशीर्वाद ही था कि सब कुछ सफलतापूर्वक हो गया।
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-आईजी संजय कुमार गुंज्याल, लीडर, एवरेस्ट अभियान-2018
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पूरा जीवन जीने जैसी एवरेस्ट की चढ़ाई
एवरेस्ट फतह करने वाले सिपाहियों में से एक वीरेंद्र काला ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि एवरेस्ट चढ़ाई पूरा जीवन जीने जैसी है। जिस तरह जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं, उसी तरह एवरेस्ट की चढ़ाई भी कई खट्टे-मीठे अनुभव कराती है। एक अहम जो दिल में बना था कि मैं सबसे अच्छा हूं, चोटी पर पहुंचते ही गायब हो गया। एक पल के लिए ऑक्सीजन उतारा तो लगा कि बस मौत है। इसी अनुभव ने अहसास कराया कि हम प्रकृति के सामने एक अणु से ज्यादा कुछ नहीं, जिसे प्रकृति चाहे जब खत्म कर सकती है। कहीं न कहीं हमारे साथ उन बुजुर्गों का आशीर्वाद भी था, जिन्हें हमने विभिन्न रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान खतरे से निकाला था। विरेंद्र काला की यह बातें सभी अतिथियों के मन को छू गईं। मुख्यमंत्री तक काला की तारीफ किए बगैर नहीं रह सके।
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