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हिमाचल के गुर्जर, निवास यूपी में और प्लॉट उतराखंड में उतराखंड

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ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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दिल मोहम्मद मूल रूप से हिमाचल प्रदेश का वन गुर्जर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1986-87 से वर्तमान तक वह शिवालिक वृत्त के तहत सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की मोहंड रेंज में निवास कर रहा है। इस रेंज में उसे परमिट भी मिला हुआ है, लेकिन पुनर्वास के लिए प्लाट उत्तराखंड के गैंडीखाता में आवंटित हुआ है। यह तो महज एक बानगी है, इसी तरह कई अन्य वन गुर्जरों को भी भूमि आवंटन में गड़बड़ी की हुई है। वन गुर्जरों के पुनर्वास में गड़बड़ी की बात विभागीय अधिकारी भी स्वीकारते हैं। कुछ का तो यहां तक कहना है कि मामले की पूर्व में जांच भी हुई थी, जो ठंडे बस्ते में चली गई और कोई कार्रवाई नहीं की गई।
वन गुर्जर घुमंतू होते हैं। मूल रूप से हिमाचल के कुछ वन गुर्जर उत्तराखंड तो कुछ यूपी के जंगलों में बसे हैं। पुनर्वास के नाम पर इन्हें उत्तराखंड के गैंडीखाता में प्लाट आवंटित किए गए हैं। इसके बावजूद ये वन गुर्जर परिवार हिमाचल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड तीनों प्रदेशों में लाभ उठा रहे हैं। नियमानुसार, जिन गुर्जर परिवारों को उत्तराखंड के पथरी और गैंडीखाता में प्लाट आवंटित किए गए हैं, उनसे यह शपथ पत्र लिया गया था कि वे 30 साल तक न तो भूमि बेचेंगे न ही किसी अन्य व्यक्ति को मौखिक अथवा लिखित रूप से हस्तांतरित करेंगे। साथ ही पशुओं को जंगलों में चराई के लिए भी नही ले जाएंगे, लेकिन हुआ इसका उल्टा।
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वन गुर्जरों ने पथरी और गैंडीखाता में प्लाट तो ले लिए, लेकिन जंगल नहीं छोड़ा। गुर्जर परिवारों ने पुनर्वास के नाम पर मिली भूमि ठेके पर दे दिया। जबकि, खुद हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के जंगलों में बसे हैं। आईएफएस अधिकारी मीनाक्षी जोशी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुनर्वास के नाम पर पथरी और गैंडीखाता में 277 ऐसे वन गुर्जर परिवारों को प्लाट आवंटित हुए, जो परमिटधारी 512 वन गुर्जर परिवारों से संबंध नहीं रखते। जानकारों का कहना है कि करोड़ों रुपये कीमत की भूमि की बंदरबांट के मामले की उच्च स्तरीय जांच हुई तो बड़ा घपला सामने आएगा और गड़बड़ी करने वाले सलाखों के पीछे होंगे।
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वन गुर्जरों को गलत तरीके से प्लाट आवंटन के मामले में उच्च अधिकारियों को कई बार लिखा जा चुका है। कुछ वन गुर्जर परिवार भूमि ले चुके हैं, लेकिन उनका छूटे परिवारों की सूची में नाम शामिल हैं। कुछ उत्तर प्रदेश के जंगल में बसे हैं, लेकिन पुनर्वास के नाम पर भूमि उनको उत्तराखंड में आवंटित हुई है। -धीर सिंह, वन विभाग अधिकारी
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