21 दिसंबर 2009 को विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने अपने समर्थकों के साथ विधानसभा का घेराव करने के लिए कूच किया था। पुलिस ने रिस्पना पुल पर उन्हें बैरिकेडिंग लगाकर रोका दिया था, जहां उनका पुलिसकर्मियों के साथ विवाद हो गया। आरोप है कि इस नेताओं ने पुलिस के साथ धक्का मुक्की और मारपीट भी हो गई। इसके बाद पुलिस ने हरक सिंह रावत समेत 25 नेताओं को मुकदमे में नामजद किया था।
ये नेता हुए उपस्थित
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह, कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य (तत्कालीन कांग्रेस नेता), सांसद (राज्यसभा सदस्य) प्रदीप टाम्टा, विधायक कुंवर प्रणव सिंह, कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल, पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिष्ट, कांग्रेस महानगर अध्यक्ष लालचंद शर्मा, वरिष्ठ कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना, संग्राम सिंह पुंडीर, भूपेंद्र उर्फ बिल्लू, महेश शर्मा, विजय सिंह चौहान, मनीष नागपाल, विवेक खंडूरी, शिवेश बहुगुणा, टिंकल अरोड़ा, विकास चौधरी, ब्रह्मस्वरूप ब्रह्ममचारी और राव असफाक।
इस मुकदमे को वापस लेने के लिए सरकार दो बार अर्जी लगा चुकी है। एक बार हरीश रावत सरकार ने अर्जी लगाई थी, जबकि इस साल भाजपा सरकार ने इसे लोक हित में हुए प्रदर्शन को बताकर वापस लेने की मांग की थी। हालांकि, दोनों ही बार न्यायालय ने इसे लोकहित की श्रेणी से बाहर रखा और सरकार की अर्जी ठुकरा दी।
हाजिरी माफी लगाई
कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत, किशोर उपाध्याय, विनोद रावत और शंकर चंद रमोला की ओर से उनके अधिवक्ता प्रस्तुत हुए। उनके अधिवक्ताओं ने इन नेताओं की ओर से न्यायालय में हाजिरी माफी प्रस्तुत की, जबकि सत्यपाल ब्रह्मचारी न तो खुद उपस्थित हुए और न ही उनका अधिवक्ता।