महाकाली और गोरी नदी के संगम पर 1871 में अस्कोट के तत्कालीन राजा पुष्कर पाल ने ज्वालेश्वर मंदिर स्थापित किया था। इसी साल मेले की शुरुआत हुई थी। धीरे-धीरे मेले का विस्तार होता रहा। बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मेले के रूप में पहचान मिली। वर्ष 1962 से पहले इस मेले में बड़ी संख्या में तिब्बती व्यापारी भी आते थे लेकिन भारत-चीन युद्ध के बाद यहां तिब्बती व्यापारियों ने आना बंद कर दिया। मेले में स्थानीय व्यापारी तिब्बत से सामान लेकर इसकी बिक्री करते हैं।
नेपाल के हुमले-जुमले घोड़ों की रहती है काफी मांग
धारचूला। जौलजीबी मेले में हर वर्ष मित्र राष्ट्र नेपाल से हुमला-जुमला के घोड़े आते हैं। हुमला जुमला के घोड़े काफी शक्तिशाली होते हैं, जिस कारण इनकी भारतीय बाजारों में काफी मांग रहती है। यूपी सहित अन्य प्रदेशों से आए व्यापारी इन घोड़ों को खरीदकर ले जाते हैं।
गर्म कपड़े और जड़ी बूटियों की होती है खूब बिक्री
मेले में गर्म कपड़े चुटके, थुलमे, कंबल, स्वेटर बर्तन, कृषि यंत्र, जड़ी बूटी सहित कई अन्य सामान की बिक्री होती है। इस मेले मे नेपाल के साथ-साथ भारत के यूपी सहित कई अन्य प्रदेशों से बड़ी संख्या में व्यापारी आते हैं।