सवाल : यानी तो क्या आम संक्रमणों के टीकाकरण और महामारी के टीकाकरण की नीति अलग-अलग होनी चाहिए?
जवाब : राष्ट्रीय टीकाकरण के लक्ष्य व्यक्ति रक्षा और रोग उन्मूलन के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। उस समय हम किसी रोग प्रवाह का सामना नहीं कर रहे होते हैं। इसलिए संवेदनशील व्यक्ति को ही टीका लगाया जाता है।
सवाल : तो फिर स्वास्थ्यकर्मियों के साथ नौकरीपेशा कामगारों को भी टीका लगना चाहिए था?
जवाब : इस महामारी ने हमें यही सीख दी है कि जो लड़ाई लड़ सकता है या कम संवेदनशील है, उसके हाथों में अस्त्र-शस्त्र दिए जाने चाहिए। एक बहुत बड़ी कार्यशील आबादी को ज्यादा दिनों तक घर के भीतर नहीं रखा जा सकता। बच्चों और बुजुर्गों को आइसोलेट कर युवाओं व नौकरीपेशा लोगों को कोरोना का टीका देकर मजबूत किया जाना चाहिए।
सवाल : आपने बताया कि दूसरी लहर का कारण पहली लहर में बुजुर्गों का संक्रमित होना और अधिक उम्र के लोगों का टीकाकारण था, इसका क्या वैज्ञानिक आधार है?
जवाब : पहली लहर छह महीने में शिखर पर आई और अगले छह महीने में ढल गई। ढलान के दौरान वायरस को म्यूटेशन के लिए समय मिल गया और वह जमा होता गया। म्यूटेशन को मोटे तौर पर रास्ता बदलने की तरह देख सकते हैं। जब बुजुर्गों की तरफ रास्ता मिलना बंद हो गया तो वायरस वयस्कों की तरफ बढ़ा। रोजगार और अन्य कार्यों के चलते वयस्कों की बड़ी आबादी गतिमान होती है। इसलिए वायरस को तेजी से फैलने में मदद मिलती गई। महामारी में बुजुर्गों का आइसोलेशन और वयस्कों का टीकाकरण होना चाहिए था। भले ही यह मानवीय न लगे, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसा किया जाना चाहिए था।
सवाल : तो फिर क्या तीसरी लहर भी आएगी?
जवाब : जब बुजुर्गों की इम्यूनिटी कम होने लग जाएगी तो तीसरी लहर का अंदेशा है। बच्चे तो अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं। जब वयस्कों का टीकाकरण पूरा हो चुका होगा तो तीसरी लहर बुजुर्गों और बच्चों की तरफ ही बढ़ेगी, ऐसी संभावना है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए फिर बूस्टर और बच्चों के लिए टीका बनाना होगा।