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अमर उजाला अपनत्व अभियान : कोरोना ने बनाया लाचार, मदद के तलबगार बच्चे बेशुमार

Wed, 26 May 2021 03:12 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

नई टिहरी के पिपली गांव में कोरोना संक्रमण से तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे जिंदा रहने के लिए कठिन संघर्ष करने को विवश हैं।
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अमर उजाला अपनत्व अभियान - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोरोना काल में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे सामने आ रहे हैं जिन्होंने या तो अपने माता-पिता को खोया है या अकेले कमाई करने वाले पिता को गंवाया है। ऐसे लाचार बच्चों को मदद की दरकार है। अमर उजाला ने ऐसे बच्चों को ढूंढने का बीड़ा उठाया तो कुछ संस्थाएं और व्यक्ति मदद के लिए भी आगे आए हैं। पाठकों के सहयोग से हमारा यह अभियान जारी रहेगा।

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उत्तराखंड में कोरोना महामारी ने जिन बच्चों से उनके माता-पिता को छीन लिया है। अमर उजाला ने उनकी पहचान के लिए यह अभियान शुरू किया है। ऐसे बच्चों के बारे में जानकारी हो तो हमें 7617566171 पर व्हाट्सअप के जरिए या ddn-cityreporter@amarujala.com पर मेल करें।

अमर उजाला अपनत्व अभियान: सामने आए कोरोना काल में माता-पिता गंवाने वाले बच्चे, अब 'वात्सल्य' दिखाइए सरकार
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नई टिहरी के पिपली गांव में कोरोना संक्रमण से तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे जिंदा रहने के लिए कठिन संघर्ष करने को विवश हैं। विपदा की इस घड़ी में बच्चों के सामने किसी मदद के हाथ का इंतजार है।

विकासखंड चंबा के सारज्यूला पट्टी के पिपली गांव निवासी विजयपाल सिंह सजवाण (42) पुणे होटल में नौकरी करता था। लॉकडाउन के बाद विजयपाल सात अप्रैल को अपने गांव लौटा था। कोरोना की स्थिति सामान्य होने के बाद उसे वापस पुणे जाना था, लेकिन 9 अप्रैल को अचानक स्वास्थ्य बिगड़ा। सांस लेने में उन्हें काफी दिक्कतें आई। जांच को अस्पताल पहुंचे, तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई।

हालत गंभीर होने पर उसे ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया गया। पत्नी बीना देवी और तीनों बच्चे पिता विजयपाल के स्वस्थ होकर घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन ऊपर वाले को शायद कुछ और ही मंजूर था। 27 अप्रैल को अस्पताल से विजयपाल की मौत की खबर आते ही घर में अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

पत्नी बीना गहरे सदमे में है और रो-रोकर उसका बुरा हाल है। सवाल यह भी है कि पिता की मौत के बाद मानसी (16),  साक्षी  (12) और सात साल के अभिनव का पालन-पोषण आखिर कैसे होगा। तीन बच्चों की स्कूल फीस बीना देवी कहां से देगी। परिवार के पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है।

बसंती के कंधों पर दो बच्चों और बुजुर्ग सास की जिम्मेदारी
ऋषिकेश होटल में नौकरी कर बड़ेडा मल्ला  (सल्डोगी) का 35 वर्षीय दीवान सिंह पत्नी, दो बच्चे और बुजुर्ग मां के साथ किसी तरह गुजर-बसर कर रहा था, लेकिन कोरोना ने इस परिवार के कमाऊ मुखिया को छीन लिया। अब दो मासूम बच्चों के साथ बुजुर्ग सास की जिम्मेदारी बसंती देवी के कंधों पर आ गई है।

नरेंद्रनगर ब्लॉक में बड़ेडा मल्ला गांव के दीवान सिंह पुत्र मोर सिंह कब कोरोना वायरस की चपेट में आ गया पता ही नहीं चला। बुखार की शिकायत होने पर उसने 13 मई को ही कोरोना जांच कराई थी। 14 मई को ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान वह 15 मई को कोरोना से जिंदगी की जंग हार गया।

घर में खेती बाड़ी का काम संभाल रही उसकी पत्नी बसंती देवी, उसका चार साल का बेटा सक्षम और पांच महीने का साकेत के साथ ही बुजुर्ग मां कमला देवी (66) पूरी तरह से दीवान सिंह पर ही निर्भर थे। बसंती का शादीशुदा देवर प्रताप भी बेरोजगार ही है। ऐसे में कहीं से मदद की कोई उम्मीद नहीं है। 

आठ वर्षीय बच्चे के साथ खुद को कैसे संभालेगी पूजा
नई टिहरी में चंबा ब्लॉक के नागणी क्षेत्र के चोपड़ियाली गांव का युवक दिल्ली नौकरी करने गया था। परिवार की सभी जरूरतें पूरी हो रही थी, लेकिन कोरोना ने परिवार की खुशियां छीन ली। गजा क्षेत्र के ग्राम गौंसारी निवासी मान सिंह चौहान ने बताया कि उनका दामाद चोपड़ियाली गांव निवासी मनवीर सिंह पयाल (38) पुत्र सूरत सिंह दिल्ली में बजाज एलियांज कंपनी में कार्यरत थे। वहां वह पत्नी पूजा और आठ वर्षीय बेटे सिद्धार्थ के साथ रह रहा था।

छोटे भाई की शादी के लिए वह पिछले माह 26 अप्रैल को गांव आए। उसके कुछ दिन बाद बुखार की शिकायत होने पर चंबा में कोरोना जांच कराई। तीन मई को सांस लेने में दिक्कत होने लगी, तो नरेंद्रनगर कोविड केयर सेंटर में भर्ती कराया गया, लेकिन स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। छह मई को उन्हें देहरादून रेफर किया गया। पूजा पति के स्वस्थ होकर घर लौटने का इंतजार कर रही थी, लेकिन 20 मई को उनकी मौत खबर आई।

आठ साल के मासूम सिद्धार्थ के सिर से पिता का साया उठ गया। अब पूजा के सामने बच्चे के भविष्य को संवारने की चुनौती है। मनवीर की मौत के बाद अब परिजनों और नाते-रिश्तेदारों को बस एक ही चिंता सता रही है कि पूजा अबोध बेटे के साथ खुद को कैसे संभालेगी।

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छह बच्चों के सिर से छिना माता-पिता का साया

हल्द्वानी में नारायण नगर कुसुमखेड़ा के वार्ड 46 स्थित एक परिवार पर कोरोना दुखों का पहाड़ बनकर टूटा। एक मई को किशोरी लाल (55) और 9 मई को पत्नी जानकी देवी का एसटीएच में कोरोना से निधन हो गया। कोरोनारूपी राक्षस के परिवार के दो लोगों को लील लेने से छह बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छिन गया और वे जिंदगी भर के लिए अकेले हो गए। आठ सदस्यों के परिवार में अब केवल छह सदस्य बचे हैं। इनमें पांच बहनें और एक भाई है। 

परिवार की मेघा ने बताया कि सबसे बड़ी सदस्य दीदी नमिता (31) बीएड की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहीं हैं। सबसे छोटा भाई इंटर में कमलुवागांजा स्थित एक स्कूल में पढ़ता है। पिता कंस्ट्रक्शन का काम करते थे और मम्मी हाउसवाइफ थी। अब दोनों के अचानक चले जाने से पूरा दबाव दीदी पर आ गया है।

बुआ के लड़के ने हर कदम पर हमारी मदद की है। मेरी सरकार से मांग है कि हमारे परिवार से किसी भी सदस्य को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए।  स्थानीय लोग और परिचितों ने राशन और आर्थिक मदद दी है। कालाढूंगी विधायक बंशीधर भगत को आर्थिक सहायता के लिए प्रार्थना पत्र दिया है। उन्होंने सरकार से भी मदद दिलवाने का आश्वासन दिया है।

कोरोना ने पहले पिता और 11 दिन बाद मां को बनाया शिकार
कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने जहां बहुत सी जिंदगियां छीन ली हैं, वहीं कुछ ऐसी जिंदगियां भी हैं जो अनाथ और बेसहारा हो गई हैं। कोरोना वायरस की वजह से बहुत से बच्चों के सिर से उनके मां-बाप का साया उठ गया है। ऐसे ही देहरादून के भागीरथीपुरम जाखन निवासी केके महाजन और रेखा महाजन के निधन के बाद उनके दो बेटे बेसहारा हो गए हैं।

महाजन दंपती के पड़ोसी दिनेश जटवानी ने बताया कि कोरोना से संक्रमित होने के बाद महाजन दंपत्ती के साथ उनका बड़ा बेटा भी मालसी स्थित एक अस्पताल में भर्ती हुए थे। जहां 13 मई को उपचार के दौरान केके महाजन का निधन हो गया। 11 दिन के अंतराल के बाद ही उनती पत्नी रेखा महाजन का भी निधन हो गया।

बताया कि लॉकडाउन के चलते बीते कुछ समय से महाजन का काम भी ठप हो गया था। महाजन दंपती ने मिलकर कुछ समय पहले ही घर में जनरल स्टोर खोला था। स्टोर को 23 साल का बड़ा बेटा चलाता है। जबकि, छोटो बेटा पढ़ाई करता है।

कोरोना ने छीना परिवार का मुखिया अब रोजी-रोटी की चिंता
बेतालघाट (नैनीताल) ब्लॉक के धनियाकोट के तोक तल्लाकोट के बहादुर सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी और छह साल के बेटे को रोजी-रोटी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। बहादुर सिंह भीमताल के एक होटल में काम करता था। बीमार होने पर उसका चचेरा भाई उसे गांव ले आया। गरमपानी में कोरोना की जांच कराई गई तो संक्रमित पाया गया।

इसके बाद उसे हल्द्वानी सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। 21 अप्रैल को उपचार के दौरान बहादुर की मौत हो गई। पति की मौत के बाद प्रेमा अपने छह साल के बच्चे के साथ अपने पैतृक गांव में पुराने मकान में रह रही है। अब रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है। बच्चे की पढ़ाई भी छूट गई है। बहादुर के तीन भाई हैं, लेकिन सभी अपने बच्चों के साथ बाहर रहते हैं। ऐसे में प्रेमा और उसके बेटे के सामने चुनौतियां बढ़ गईं हैं। साथ ही आजीविका चलाना मुश्किल हो गया है। बिरादरी वाले ही उनकी सहायता कर रहे हैं। प्रेमा को अपने बेटे की पढ़ाई और भविष्य की चिंता सता रही है।

पीड़ित परिवार के लिए हमारे स्तर से जो मदद होगी हम उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे ताकि उन्हें परेशान न होना पड़े।
- विनोद कुमार, एसडीएम कौश्याकटौली

कोरोना से माता-पिता को खोने वाले बच्चों की मदद के निर्देश
कोरोना से अपने माता-पिता को गंवाने वाले बच्चों की मदद के लिए सरकार ने वात्सल्य योजना की घोषणा की, लेकिन सिस्टम अब तक कुछ बच्चों को ही ढूंढ पाया है। अमर उजाला ने ऐसे बच्चों की जानकारी के लिए अपनत्व अभियान चलाते हुए मंगलवार को कुछ बच्चों की खबर प्रकाशित की है। जिसका प्रदेश सरकार की ओर से संज्ञान लेते हुए बच्चों की मदद के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं। 

महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास राज्यमंत्री ने कहा कि कोविड की वजह से अपने माता-पिता को खो चुके बच्चों के मामले में किसी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बच्चों की मदद के लिए नोडल अधिकारी के साथ ही सभी जिला प्रोबेशन अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि बच्चों की हरसंभव मदद की जाए। 
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