कोरोनेशन अस्पताल (जिला अस्पताल) मरीजों के लिए रेफरल सेंटर बन गया है। यहां आने वाले अधिकतर मरीजों को दून अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता है। कई तीमारदारों ने बताया कि मरीजों से कहा जाता है कि दून में अच्छे डॉक्टर हैं वहीं इलाज करवाइए। दून अस्पताल की इमरजेंसी के मुताबिक, रोजाना 8-10 मरीज यहां से रेफर हो दून अस्पताल भेजे जा रहे हैं। बता दें कि कोरोनेशन में वेंटिलेटर सहित अन्य सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
कोरोनेशन अस्पताल 2016 तक उप जिला संयुक्त चिकित्सालय था। उस दौरान दून अस्पताल का नाम जिला अस्पताल हुआ करता था। 2016 में दून अस्पताल को दून मेडिकल कॉलेज की श्रेणी मिल गई। उसके बाद कोरोनेशन अस्पताल को उप जिला से जिला अस्पताल बना दिया गया। दून अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गौरव मुखीजा ने बताया कि रोजाना कोरोनेशन अस्पताल से दो-तीन बच्चे रेफर होकर आते हैं। कोरोनेशन में बच्चों को एनआईसीयू में इलाज नहीं दिया जाता है। अधिकतर बच्चों में यह कहा जाता है कि वहां बेड फुल हैं।
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जांच रिपोर्ट के लिए तीन दिन का इंतजार
पिछले दिनों डेंगू मरीज बढ़ने पर स्वास्थ्य सचिव ने कोरोनेशन अस्पताल का निरीक्षण किया था। उस दौरान मरीजों ने बताया था कि यहां पर जांच रिपोर्ट के लिए तीन दिन इंतजार करना पड़ता है। हालांकि, अस्पताल में चंदन लैब से निशुल्क जांच की सुविधा उपलब्ध है।
अल्ट्रासाउंड के लिए भी इंतजार
कोरोनेशन में एक दिन में सीमित मरीजों के लिए अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं। रोजाना ‘आज के अल्ट्रासाउंड पूरे हो गए हैं, बिना टोकन अल्ट्रासाउंड नहीं होंगे’ लिखा बोर्ड लटका दिया जाता है। अल्ट्रासाउंड के लिए टोकन सुबह 8:00 से 8:30 बजे तक बांटे जाते हैं। उसके बाद आने वाले मरीजों को टोकन नहीं मिल पाते। एक दिन में 50 तक अल्ट्रासाउंड हो जाते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट की कमी है। कोरोनेशन अस्पताल की पीएमएस डॉ. शिखा जंगपांगी ने बताया कि अस्पताल में स्टाफ की कमी है। स्टाफ बढ़ाने के लिए बात की जा रही है।