कांग्रेस ने बगावती तेवर दिखाने वाले नेताओं को मनाने का जिम्मा पार्टी में उनके पैरोकार नेताओं को ही सौंपा है। पार्टी के बड़े नेता जिन बागियों को टिकट देने की सिफारिश कर रहे थे अब वे ही समझाने का काम करेंगे। इसके लिए पार्टी ने पहले ही दावेदारों के बायोडाटा और सूची में उन नेताओं के नाम भी लिख लिए थे।
दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कार्यालय में नाकाम रहे दावेदारों के फैक्स और शिकायती चिट्ठियां पहुंच रही हैं। पंजाब के बाद अब उत्तराखंड में भी बागियों को समझाओ-बुझाओ पर काम शुरू हो गया है।
कांग्रेस की बागियों और दलबदल करने वालों से निपटने के लिए अनोखी रणनीति कारगर साबित हो रही है। दरअसल हर बार टिकट बंटवारे के बाद पार्टी में अधिकृत उम्मीदवार को विरोधी दल से अधिक अपनों के विरोध का सामना करना पड़ता था। इसी को ध्यान में रखकर पार्टी ने इस बार पांच राज्यों के लिए फार्मूला निकाला था। पैनल में शामिल प्रमुख दावेदारों के लिए कौन नेता पैरवी कर रहा है इसका उल्लेख भी उसके नाम के सामने किया गया है। बगावत करने वाले या पार्टी का नुकसान पहुंचाने वाले को समझाने और साथ जोड़े रखने का जिम्मा उन्हीं नेताओं पर होगा।
पंजाब में बागियों को पक्ष में करने के लिए ये तरकीब सफल रही है। बगावत का झंडा बुलंद करने वाले करीब 30 लोगों को उन्हीं नेताओं समझाकर बैठा लिया है जो अधिकृत उम्मीदवार या किसी अन्य की बात सुनने को तैयार नहीं थे।
पार्टी के सामने फिलहाल उत्तराखंड बड़ी चुनौती है। बागियों के खुलकर विरोध करने को पार्टी चुनाव में नुकसान मानती है। देहरादून स्थित प्रदेश कार्यालय में तोड़फोड़ पर आलाकमान चिंतित है।
प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की सहसपुर सीट पर बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं। वहीं मुख्यमंत्री हरीश रावत का नाम घोषित होने के बाद वहां से दावा ठोंक रहे जिला पंचायत अध्यक्ष ने पार्टी छोड़ दी है। कुमाऊं की गदरपुर सीट पर भी गदर मचा है यहां परिवारवाद की शिकायत सामने आई है। सितारगंज में भी दमदार दावेदार रहे नेता अधिकृत उम्मीदवार का नुकसान कर सकते हैं। रामनगर सीट पर भी पार्टी को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
गढ़वाल में भी विरोध के सुर तेज हैं। लक्सर सीट पर सैनी समाज ने पंचायत कर अंतरिक्ष सैनी को लड़ाने की तैयारी कर ली है। रायपुर में पार्टी ने उम्मीदवार नहीं उतारा है लेकिन संभावित एक नाम पर राय बनते ही जबरदस्त विरोध शुरू हो गया है। ज्वालापुर में पिछली बार कम अंतर से हारी ब्रजरानी निर्दलीय उतरने की तैयारी में हैं। खानपुर पर विरोध हो रहा है। मुख्यमंत्री के करीबी कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह की नाराजगी भी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। लिहाजा इसका जिम्मा हरीश रावत पर है।