उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त ने कांग्रेस को इस काबिल भी नहीं छोड़ा कि वह हार के दोषियों के खिलाफ एक्शन ले सके।
जल्द ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी समीक्षा बैठक होनी थी, जिसे फिलहाल टाल दिया गया है। हार से पस्त पड़े प्रत्याशी और पदाधिकारी फिलहाल इस मनोदशा में नहीं कि हार के कारणों की पड़ताल करें। बहरहाल, पार्टी के सामने अपने खिसकते जनाधार को बचाने के सिवाय कोई चारा नहीं है। जानकारों की मानें तो पार्टी में रहते हुए जिन लोगों ने चुनाव में प्रत्याशी के लिए काम नहीं किया, वह उन्हें भी सबक सिखाने की स्थिति में नहीं है।
विधानसभा चुनावों में इतिहास के सबसे खराब प्रदर्शन के बाद अब प्रदेश कांग्रेस को कुछ नहीं सूझ रहा है। उसके नेता समझ नहीं पा रहे हैं कि वह कहां से शुरुआत करें। पार्टी ने पराजय तो वर्ष 2007 के चुनाव में भी झेली थी, मगर हार के बावजूद पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल इस कदर नहीं टूटा था। पूरा दमखम झोंक कर पार्टी न केवल खोये आत्मविश्वास को हासिल करने में कामयाब रही बल्कि उसने सत्ता में वापसी भी की।
मगर इस बार के हालात पहले से एकदम जुदा हैं। लोहाघाट विधानसभा सीट का परिणाम भी भाजपा के पक्ष में जाने के बाद कांग्रेस 10 सीटों पर सिमट गई है। चुनाव के बाद वह सिर्फ सदन के भीतर ही कमजोर नहीं है, बल्कि बाहर भी उसे अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना है।
ऐसे हालात में पार्टी इस लायक नहीं बची कि वह बचे-खुचे कुनबे पर भी अनुशासन की तलवार भांज दे। जिन्हें एक्शन लेना है वे खुद अपने फैसलों और मनमानी को लेकर कठघरे में खड़े हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव का चेहरे थे और पार्टी सभी 70 सीटों में उनके चेहरे पर वोट मांग रही थी। मगर वह खुद दो सीटों से चुनाव हार गए।
ये दोनों सीटें मुख्यमंत्री की खुद की पसंद की थी। पार्टी के सेनापति किशोर उपाध्याय को जिस सीट पर उतारा गया, वहां उनका कोई आधार ही नहीं था। ऐसे में पहले दिन से ही उनकी हार की चर्चाएं कांग्रेसी हलकों में गरमा रही थीं। जाहिर है कि जब पार्टी के क्षत्रपों की पराजय की ये दास्तां हैं तो वे बाकी प्रत्याशियों की हार के लिए किसे दोषी ठहराएंगे और किस पर एक्शन लेंगे। जिन्होंने बगावत की, उन्हें चुनाव के दौरान ही पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।
वह भी उन हालातों में जब कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है। पार्टी के एक पदाधिकारी की मानें तो पार्टी इस स्थिति में नहीं है कि वह अनुशासन के नाम किसी नेता या कार्यकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करे। अब सोचने वाली बात यही है कि पार्टी के बचे-खुचे कुनबे को कैसे संभाला जाए और उसे बढ़ाने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाए। जानकारों की मानें तो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी को अपनी खोयी ताकत हासिल करने के लिए रिवाइवल अभियान भी चलाना होगा।
पार्टी प्रत्याशियों की बैठक बुलाई जानी है, मगर अभी इसमें समय लगेगा। पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता चर्चा करेंगे और उसके बाद पार्टी प्रत्याशियों और पदाधिकारियों के साथ बैठक होगी।
- किशोर उपाध्याय, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस