तेजी से फैल रहे चीड़ के जंगल
प्रो. सती ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि वनस्पति संरचना में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बढ़ते तापमान के कारण चीड़ के जंगल तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फैल रहे हैं, जिससे पारंपरिक बांज के वन सिकुड़ रहे हैं। यह परिवर्तन हिमालय की जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए खतरे का संकेत है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पिछले तीन दशक में हिमावरण में भारी कमी आई है। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और नदियों के प्रवाह पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में यह स्थिति अधिक गंभीर है।
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बारिश से बदले पैटर्न से बढ़ा आपदा का खतरा
प्रो. सती ने बताया कि अध्ययन में सामने आया कि वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता और चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि ने आपदा का खतरा कई गुना बढ़ा दिया है। बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झील फटने जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक आपदाएं दर्ज की गईं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है और अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसके परिणाम और भयावह हो सकते हैं।