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Uttarakhand: उच्च हिमालयी भूरे भालू ने काले भालू के क्षेत्र में बनाया ठिकाना, हाइबरनेशन की अवधि कम होना वजह

Tue, 04 Aug 2026 08:00 AM IST
Renu Saklani विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

न्यजीव संस्थान के अध्ययन में सामने आया है कि उच्च हिमालयी भूरा भालू अब काले भालू के पारंपरिक आवास में रहने लगा है, जिसकी बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन और भोजन की कमी मानी जा रही है।
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भालू - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उच्च हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाले भूरे भालू ने अब काले भालू के इलाके में ठिकाना बना लिया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। दोनों भालू प्रजातियां आपसी संघर्ष से बचने के लिए खुद को ढाल रही हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों में भालू की तीन प्रजातियां मिलती हैं। तराई क्षेत्र में स्लोथ बियर, 1800 से 3000 मीटर पर काला भालू पाया जाता है। वहीं, 2800 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर भूरा भालू का वास स्थल होता है। अब भूरा भालू नीचे आकर काले भालू के वास स्थल में पहुंच गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के रिसर्च स्कॉलर अमरपाल सिंह ने बताया कि यह बदलाव ग्रेट हिमालय और पीर पंजाल क्षेत्र से जुड़ा है। संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक सत्यकुमार को स्थानीय लोगों ने दोनों भालुओं के साथ रहने की बात बताई थी। इसके बाद 3 अगस्त, 2023 को अध्ययन शुरू किया गया। ललित कुमार शर्मा और साल्वाडोर के निर्देशन में जेडएसआई के सहयोग से यह अध्ययन हुआ।

दोनों संघर्ष से बचने की कोशिश करते

रिसर्च स्कॉलर अमरपाल सिंह के अनुसार, भूरा और काला भालू एक साथ रह रहे हैं। दोनों प्रजातियां आपसी संघर्ष से बचने की कोशिश करती हैं। मसलन, जब भूरा भालू भोजन की तलाश में निकलता है, तब काला भालू बाहर नहीं आता। वे बांज समेत अन्य मिश्रित और शंकुधारी वनों का इस्तेमाल करते हैं। प्री विंटर के समय भूरा भालू अपने ऊंचे इलाके में लौट जाता है, फिर अप्रैल-मई में वापस काले भालू के क्षेत्र में आता है।

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क्या वजह है

रिसर्च स्कॉलर सिंह बताते हैं कि भूरा और काला भालू के हाइबरनेशन (शीत निष्क्रियता) पर प्रभाव पड़ा है। भूरा भालू का चार महीने का हाइबरनेशन समय अब कम हो गया है। बर्फ कम गिरने या देर से गिरने, उसके जल्द पिघलने या ठंड कम होने से यह बदलाव आया है। ऊंचाई वाले इलाकों में भोजन की कमी भी भूरा भालू के नीचे आने की वजह है। काला भालू का हाइबरनेशन अधिक प्रभावित हुआ है, जिससे वे आबादी वाले इलाकों में पहुंचते हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं।

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