लोक सभा चुनाव 2014 में इस बार सियासी दलों में चार धाम यात्रा को लेकर सियासी दंगल होने के पूरे आसार हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत भी इसे भांप गए हैं लिहाजा उनका पूरा फोकस चार धाम यात्रा को सुगम बनाने का है।
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मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनके लिए चार धाम नहीं छह धाम कैलाश मानसरोवर और हेमकुंड साहिब यात्रा भी उतनी महत्वपूर्ण है जिसे समय पर शुरू करना प्राथमिकता है।
केदारनाथ धाम के पट चार मई को खुल रहे हैं और प्रदेश में मतदान सात मई को है। ऐसे में नफे-नुकसान के गणित में उलझे सियासी दलों के लिए पूरा मौका होगा कि पक्ष-विपक्ष की कमजोरियों और उपलब्धियों को भुनाया जा सके।
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चार धाम यात्रा पर कई राज्यों की निगाह
जून 2013 की आपदा के बाद से ही चार धाम यात्रा पर कई राज्यों की निगाह है। वर्तमान कांग्रेस सरकार की पूरी कोशिश है कि चार धाम यात्रा को सही समय पर और सही तरीके से शुरू किया जा सके।
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कांग्रेस हाईकमान भी इस पर नजरें गढ़ाए हुए हैं। माना जा रहा है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन केपीछे एक कारण यह भी था कि चार धाम यात्रा की तैयारी को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा हाईकमान को विश्वास नही दिला पाए थे कि यात्रा की तैयारी पूरी हो ही जाएगी।
केदारनाथ धाम के पट चार मई को खुल रहे हैं। इसी दिन से केदार धाम की यात्रा भी शुरू हो जाएगी। मई माह में ही अन्य तीनों धामों की यात्रा भी शुरू हो जाएगी।
पुनर्निर्माण को लेकर भाजपा ने बोला हमला
इस समय सरकार का पूरा फोकस चार धाम यात्रा की सड़कों पर हैं। प्रदेश में विपक्ष भी इस पर नजर गढ़ाए बैठा है।
हाल ही में कांग्रेस के गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज ने भाजपा का दामन थामा और इसके तुरंत बाद ही उन्होंने पुनर्निर्माण को लेकर प्रदेश सरकार पर हमला बोला।
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ऐसा कर महाराज ने यह संकेत तो दे ही दिया कि कम से कम भाजपा आपदा के किसी मामले को लेकर सरकार को बख्शने के मूड में नही है। प्रदेश में मतदान सात मई को है और सियासी दलों का प्रचार चार मई के आसपास चरम पर होगा।
ऐसे में चार धाम यात्रा की सही शुरूआत को प्रदेश की कांग्रेस सरकार अपनी उपलब्धियों से जोड़ने में कतई नहीं चूकेगी। कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात को स्वीकार भी कर रहे हैं। दूसरी ओर किसी भी तरह की कमी को भाजपा कतई नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं है।
प्रदेश की आर्थिकी को हो सकता है नुकसान
चार धाम यात्रा के इस सियासी दंगल का नुकसान प्रदेश की आर्थिकी को भी हो सकता है। चार धाम यात्रा से पर्यटन भी जुड़ा हुआ है।
प्रदेश की आर्थिकी के हिसाब से यह संवेदनशील मामला है। चुनाव के चलते किसी भी तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। यह भी आशंका है कि किसी कमी को छिपाने की भी सत्ता पक्ष पूरी कोशिश करे या फिर उपलब्धि को बढ़ा चढ़ा कर पेश करे।
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दोनों ही स्थितियों में चार धाम यात्रा को लेकर उठाए जा रहे सवाल और गहराएंगे। प्रदेश के लिए इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि यात्रा में आने वाले यात्रियों की संख्या कितनी होगी।
बेहद कम यात्री अगर पहुंचे तो आपदा से उबरने में प्रभावित क्षेत्रों को समय लगेगा। चार धाम यात्रा पर मुख्यमंत्री हरीश रावत की साख भी दांव पर लगी हुई है।
खुद कांग्रेस के अंदर का एक धड़ा चार धाम यात्रा की तैयारी ढंग से न होने पर रावत खेमे के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। दूसरी ओर भाजपा भी सरकार को इस मामले में सरकार को घेरने की पूरी कोशिश कर रही है।
- सड़कों का पुनर्निर्माण। चार धाम यात्रा रूट की कई सड़कों को अभी सुधारा जाना बाकी है। इसी तरह संपर्क मार्ग बनाए जाने हैं।
केदार धाम की व्यवस्था को अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। केदारनाथ धाम में किसी खतरे की पूर्व चेतावनी, यात्रियों के ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था, मलबे का ट्रीटमेंट आदि काम होने बाकी है।
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- यात्रियों के पंजीकरण, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था। - इस बार केदारनाथ धाम का पैदल मार्ग 14 किलोमीटर की बजाय 22 किलोमीटर का है। ऐसे में पैदल मार्ग पर भ्ीा पड़ाव की जरूरत पड़ सकती है।
- असमय मौसम के बदलते रुख से निपटने का भी इंतजाम किया जाना बाकी है। - मंदाकिनी के किनारे की रुद्रप्रयाग तक तमाम अर्थव्यवस्था अभी आपदा से उबर नहीं पाई है। अधिकतर होटल, सराय, यात्री विश्राम गृह, ढाबे आदि फिर से नहीं बन पाए हैं।
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जाहिर है कि यात्रियों को ऐसे में खासी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। सरकार के सामने एक चुनौती यात्रा रूट पर इस तरह की व्यवस्था करने की भी है।