ऐसे में जब 1977 में मंदिर के कपाट खुलने का समय आया तो पुष्पवाण के विरोध को देखते हुए समिति की ओर से बाबा केदार की डोली को वाहन से ऊखीमठ से गौरीकुंड के लिए रवाना किया गया। पुष्पवाण को इस बात का पता चला और उन्होंने गुप्तकाशी पहुंचकर वाहन को रुकवा दिया।
पूर्व प्रमुख लक्ष्मी प्रसाद भट्ट ने बताया कि डोली को जमाणियों के माध्यम से पैदल मार्ग से फाटा होते हुए गौरीकुंड पहुंचाया गया। तत्कालीन वेदपाठी और चंडिका मंदिर के पुजारी आचार्य हर्ष जमलोकी ने बताया कि पूर्व विधायक पुष्पवाण ने जीवित रहते पशुबलि को बंद करने में अहम भूमिका निभाई थी।