इसके तहत अध्ययन किया जाएगा कि झील कितना पानी झेलने में सक्षम है। उससे अधिक मात्रा में पानी होने की स्थिति में इसे पंपिंग के जरिये या बोरिंग कर बनाई जाने वाली टनल के जरिये बाहर निकाला जाएगा। उन्होंने बताया कि इस तकनीक में यह महत्वपूर्ण है कि पानी को बाहर निकालते समय इसका कोई गलत प्रभाव पहाड़ या ग्लेशियर के अन्य हिस्से पर न पड़े। सिक्किम में यह प्रयोग सफल रहता है तो देश की अन्य ग्लेशियर झीलों में भी अपनाया जाएगा।
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, सिक्किम की साउथ ल्होनक झील का आकार 55 वर्षों में करीब दस गुना बढ़ चुका है। झील कहीं से ब्रेक होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान चुनथांग गांव में होगा। इसके अलावा लाचेन गांव भी काफी हद तक प्रभावित होगा।
आईआईटी रुड़की में हुए एक शोध के मुताबिक, लाचेन गांव से करीब पांच किमी पहले ब्रिज तक झील का पानी महज आठ मिनट में पहुंच जाएगा और इसे पूरी तरह तहसनहस कर देगा। बताया जा रहा है कि वर्ष 1962 से 2016 के बीच झील का आकार 0.103 वर्ग किमी से बढ़कर 1.37 वर्ग किमी हो चुका है। इससे झील के टूटने का खतरा बढ़ रहा है। इसके टूटने की स्थिति में पानी 13.6 प्रति सेकेंड की तीव्रता से पहुंचेगा और चुनथांग गांव काफी हद तक प्रभावित होगा।