सरकार चाहे कांग्रेस की आए या भाजपा की, उत्तराखंड तमाम नई चुनौतियों के साथ मिलेगा। न केवल आर्थिक हालात दुरुस्त करना, बल्कि हजारों की तादाद में हुई घोषणाओं को पूरा करना नई सरकार के लिए सिरदर्द होगा।
इसके अलावा आपदा से निपटने के इंतजामों को बेहतर करने के अलावा रोजगार बढ़ाने और पलायन रोकने जैसी चुनौतियां भी अहम होंगी। विधानसभा चुनाव-2017 निपटने के साथ अब यह सवाल उठने लगे हैं कि 11 मार्च के बाद सत्तासीन होने वाली पार्टी इन चुनौतियों से कैसे निपटेगी?
अरबों का कर्ज: आर्थिक चुनौतियों से जूझते उत्तराखंड पर चार सौ अरब रुपये से ज्यादा का कर्ज है। इस कर्ज पर साल में करीब चार हजार करोड़ रुपये केवल ब्याज देना होता है। इसमें एक बड़ा बोझ नॉन प्लान खर्चों का है, जिसमें वेतन सबसे अहम है।
हालात ये हैं कि कर्मचारियों का वेतन बमुश्किल दिया जा रहा है। बावजूद इसके तमाम आयोग और संस्थाएं बनाकर करोड़ों का वेतन सेवानिवृत्त अफसरों को बांटा जा रहा है। ऐसे में पहले तो कर्ज की राशि कम करने के साथ ही खर्चों पर नियंत्रण करना नई सरकार की प्राथमिकता होगी, जिससे निपटना आसान नहीं है।
हजारों घोषणाएं: मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने ढाई साल के कार्यकाल में लगभग चार हजार से ज्यादा छोटी और बड़ी घोषणाएं की हैं। दावा किया गया है कि 70 फीसदी घोषणाओं पर काम शुरू हो चुका है और ज्यादातर को पैसा भी जारी किया जा चुका है। मगर हकीकत यह है कि इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए अरबों रुपये की रकम चाहिए। नई सरकार के सामने इन घोषणाओं को पूरा करना सुरसा के मुंह जैसा होगा। पहले ही आर्थिक रूप से कमजोर उत्तराखंड का इन घोषणाओं का बोझ झेल पाना कुछ कम बड़ा चैलेंज नहीं है।
पलायन पर रोक: राज्य के ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में पलायन रोकने के दावे तो तमाम हुए, मगर असल स्थिति यह है कि पलायन बदस्तूर जारी है। हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में मतदाताओं की संख्या से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पलायन रोकने में सरकारें पूरी तरह फेल साबित हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह रोजगार सृजन न कर पाना है। कौशल विकास और तमाम योजनाएं तो चलाईं गईं, लेकिन अफसर उन्हें कागजों से बाहर लाए बगैर ही वाहवाही लूटते रहे। दुर्गम इलाकों में रोजगार के साधन पनपाकर पलायन रोकना भी आने वाली सरकार के सामने बड़ी जिम्मेदारी होगी।
शिक्षा और स्वास्थ्य: डॉक्टर विहीन अस्पताल और शिक्षक विहीन स्कूलों की समस्या उत्तराखंड में आदि काल से व्याप्त है। शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त न होने के चलते भी दूर गांवों के लोग पलायन करने को मजबूर होते हैं। हालात यह हैं कि स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती को लेकर अभिभावकों को अनशन तक करना पड़ता है। उधर, ऊंचाई पर मौजूद अस्पतालों में कुछ ऐसा ही हाल चिकित्सकों का है। डॉक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार ही नहीं हैं। ऐसे में दुर्गम इलाकों में रहने वालों को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करना भी बड़ा काम है।
आपदा प्रबंधन: आपदा प्रबंधन उत्तराखंड की बड़ी समस्याओं में से एक है। पिछले कुछ सालों में पहाड़ी जनपदों में आपदा से खासा नुकसान हुआ है, बावजूद इसके कोई ठोस आपदा प्रबंधन नीति राज्य की सरकारें नहीं बना पाई हैं। अगर कुछ हुआ है तो बस सियासत। राज्य सरकार आपदा के लिहाज से संवेदनशील तीन सौ के करीब गांवों को चिह्नित करके बैठी है, मगर उनके विस्थापन के लिए अब तक कुछ नहीं हो सका। पूछने पर गेंद केंद्र के पाल में डाल दी जाती है। हर बार आपदा प्रबंधन सिर्फ सियासी मुद्दा बनकर ही रह जाता है।
राजनीतिक अस्थिरता: राजनीतिक अस्थिरता के लिहाज से भी उत्तराखंड काफी चर्चा में रहता है। पिछले 16 सालों में उत्तराखंड ने आठ मुख्यमंत्री देखे हैं, ऐसा शायद ही देश के किसी दूसरे राज्य में हुआ हो। राजनीतिक दल सत्ता के लोभ में किसी भी हद को पार करने से गुरेज नहीं करते। पिछले साल मार्च में जैसी टूटफूट और बगावत हुई, वह तो राज्य के इतिहास में काले अध्याय की तरह है। शायद इसी वजह से राज्य के कल्याण की कोई ठोस योजना आज तक नहीं बन पाई।
पर्यटन नीति: राज्य का सबसे बड़ा आर्थिक आधार पर्यटन है, मगर फिर भी यहां अब तक पर्यटन नीति को नहीं बनाया जा सका है। इसके उलट हिमाचल प्रदेश पर्यटन के लिहाज से काफी समृद्ध हो चुका है। पर्यटन के प्रति उदासीनता से राज्य की जीडीपी को भी खासा नुकसान होता है। तीर्थाटन के अलावा साहसिक पर्यटन और नए पिकनिक स्पॉट चिह्नित करने की दिशा में सरकार को ध्यान देना जरूरी है।
सिंचाई के इंतजाम: पहाड़ी इलाकों में लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन खेती है, मगर सिंचाई के पर्याप्त इंतजामों की वजह से खेती रूठ गई है। अनाज उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। तराई क्षेत्रों में भी गन्ने की पैदावार लगातार घटी है। बागवानी से भी राज्य को खासा फायदा होने की संभावना है, मगर उस ओर ध्यान नहीं है। पहाड़ों पर बेशकीमती जड़ी-बूटियों का दोहन जारी है, मगर उसे रोकने के भी कोई ठोस इंतजाम नहीं हैं। नई सरकार को इस बारे में भी गंभीरता से सोचना पड़ेगा।