-25 मार्च, शैलपुत्री का पूजन, वाणी पर नियंत्रण रखें
-26 मार्च, ब्रह्माचारिणी का पूजन, ब्रह्मचार्य का पालन करना
-27 मार्च, चंद्रघंटा का पूजन, सच्ची व स्वच्छ बातों का श्रवण करना
-28 मार्च, कुष्मांडा का पूजन, भोजन आदि पर नियंत्रण,
-29 मार्च, स्कंदमाता का पूजन, नेत्र पर नियंत्रण,
-30 मार्च, कात्यायनी का पूजन, विचारों में नियंत्रण करना सिखाता है।
-31 मार्च, कालरात्रि का पूजन, काल पर नियंत्रण करने
- 1 अप्रैल (अष्टमी), महागौरी का पूजन, व्रती के अहंकार की प्रवृति समाप्त करने
- 2 अप्रैल (नवमी), सिद्धीदात्री का पूजन, माता हर कार्य सिद्ध करने का आशीर्वाद देती है।
सामान्य मिट्टी के बर्तन या ताम्र बर्तन में कलश की स्थापना कर सकते हैं। अखंड जोत करने वाले श्रद्धालु कलश स्थापना में दो नारियल, इसमें से एक कलश के ऊपर तथा दूसरा अखंड ज्योत के पास रखें।
पहले मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें हरियाली के प्रतीक जौं बोएं। इसके बाद कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। मां की प्रतिमा स्थापित और पूजन करने से पहले भगवान गणेश का पूजन करें। प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।