उत्तराखंड प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं नियोजन प्राधिकरण (कैंपा) के प्रोजेक्ट अब राज्य सरकार पास नहीं कर पाएगी।
कैंपा प्रोजेक्ट्स को पास करने का अधिकार अब केंद्र सरकार के पास रहेगा। कैंपा एक्ट में इस संबंध में व्यवस्था कर दी गई है। उत्तराखंड समेत देश के अन्य राज्यों ने इस व्यवस्था पर एतराज जताया है। बताया जा रहा है कि कैंपा परियोजना में राज्यों में की जा रही गड़बड़ी की वजह से एक्ट में यह प्रावधान किया गया है।
राज्य में कैंपा के प्रोजेक्ट्स अभी तक मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित स्टीयरिंग कमेटी की बैठक में पास किए जाते थे। प्रोजेक्ट पास होने के बाद इन्हें केंद्रीय कैंपा को धनराशि आवंटित करने के लिए भेज दिया जाता था। केंद्रीय कैंपा के फंड से राज्य को संबंधित धनराशि आवंटित कर दी जाती थी, लेकिन अब यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है।
बीते साल उत्तराखंड कैंपा स्टीयरिंग कमेटी ने 346 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट पास करके केंद्रीय कैंपा को भेजे थे, इसमें से लगभग 100 करोड़ रुपये मिले हैं। कैंपा फंड में उत्तराखंड के 2200 करोड़ रुपये जमा हैं। देश के सभी राज्यों की कैंपा फंड में 42 हजार करोड़ रुपये की धनराशि है।
मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली स्टीयरिंग कमेटी अब सिर्फ प्रोजेक्ट की संस्तुति ही कर सकेगी। प्रोजेक्ट को पास करना या न करना केंद्र पर निर्भर करेगा। अभी तक केंद्रीय कैंपा का संचालन तदर्थ व्यवस्था पर किया जा रहा था। केंद्र सरकार ने अगस्त, 2016 में कैंपा एक्ट पास कर दिया है। इसमें ये प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान पर राज्यों में खलबली मच गई है। उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों ने केंद्र के समक्ष अपना एतराज जताया है।
मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने पिछले दिनों केंद्र में हुई सचिवों की बैठक में उत्तराखंड का पक्ष रखा है। इसके अलावा अन्य राज्य भी अपने स्तर से एतराज दर्ज करा रहे हैं। शासन की ओर से पक्ष रखा गया है कि राज्य अपनी परिस्थितियों के लिहाज से योजनाएं तैयार करते हैं।
वे अपनी समस्याओं को बेहतर समझते हैं, इसलिए प्रोजेक्ट पास करने का अधिकार राज्यों को ही होना चाहिए। केंद्र से यह भी कहा गया है कि चूंकि कैंपा के मद में राज्य का ही पैसा होता है, तो राज्य निर्धारित मानकों के दायरे में अपने तरीके से जो बेहतर समझे, उस प्रोजेक्ट में धनराशि खर्च करे। केंद्र का प्रोजेक्ट पर अलग नजरिया भी हो सकता है।
इस वजह से प्रावधान
बीते दिनों केंद्र ने राज्यों में खर्च किए जा रहे कैंपा धनराशि के संबंध में जानकारी ली थी। इसमें पता चला कि राज्य केंद्रीय कैंपा के मानकों से अलग हट कर प्रोजेक्ट में धनराशि खर्च कर रहे हैं, जिसकी वजह से यह प्रावधान शामिल किया गया है। राज्यों के एतराज जताने के बाद कैंपा एक्ट के रूल्स को अभी तक जारी नहीं किया गया है। राज्यों के पक्षों पर विचार किया जा रहा है। अगर ये तार्किक हुए तो नियमावली में राहत दी जा सकती है। दो-तीन महीने के अंदर कैंपा एक्ट की नियमावली अधिसूचित कर दी जाएगी।
एक्ट पास हो गया है। इसकी नियमावली का ड्राफ्ट भी तैयार हो गया है। दो-तीन महीने के अंदर अधिसूचना जारी हो जाएगी। अब राज्य कैंपा प्रोजेक्ट बनाकर इसकी संस्तुति करके भेजेगा।
- डा. एसएस नेगी, डीजी, एवं स्पेशल सेक्रेटरी, केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
बिना प्रावधान के खर्च कर दिया पैसा
कैंपा की धनराशि प्रमुख रूप से क्षतिपूरक वनीकरण के लिए खर्च की जाती है, लेकिन राज्यों ने इसे अलग मद में खर्च कर दिया। उत्तराखंड में 32 करोड़ रुपये से राजाजी नेशनल पार्क टाइगर रिजर्व में अलग-अलग स्थानों पर दीवारें बना दी गईं। दीवार बनाने के लिए कैंपा के मद का प्रावधान नहीं है। कैंपा धनराशि से भवन निर्माण और गेस्ट हाउस बना दिए गए। इसके साथ ही भवनों की मरम्मत करा दी गई।
चुनावी गणित के मद्देनजर राज्यों ने बहुत सी घोषणाएं कर डालीं और इन्हें खींचकर जबरदस्ती कैंपा के मद में डाल दिया गया। वन्य जीवों के संबंध में योजनाओं को भी कैंपा के मद में डाला गया। कुछ राज्यों ने कैंपा धनराशि से वाहनों की खरीदारी कर ली। वन्य जीवों से बचाव के लिए फेंसिंग और दीवार बनवाई गई। इसके अलावा भी राज्य के विभिन्न प्रोजेक्ट में कैंपा से धनराशि का प्रावधान कर दिया गया। इसमें कैंपा के नियमों को दरकिनार कर दिया गया।