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गंगा सफाई पर हरीश ने केंद्र के पाले में डाली गेंद

Fri, 27 Mar 2015 02:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में गंगा की सफाई पर होने वाला पूरा खर्च केंद्र से मांगा है। रावत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बृहस्पतिवार को दिल्ली में हुई नमामि गंगे परियोजना की बैठक में शिरकत कर रहे थे।
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सीएम ने लगे हाथ प्रधानमंत्री के सामने उत्तरकाशी संवेदी क्षेत्र (ईको सेंसिटिव जोन), जल विद्युत परियोजनाओं में आड़े आ रही पर्यावरणीय बाधा, पलायन और स्थानीय रोजगार आदि का भी जिक्र कर डाला।

सीएम ने कहा कि विकास परियोजनाओं पर समझौता कर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति उत्तराखंड के योगदान का सम्मान करते हुए राज्य को भविष्य में होने वाली राजस्व हानि की उचित प्रतिपूर्ति भी की जानी चाहिये।
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प्राकृतिक आपदा में गंगा नदी से संबंधित ढांचागत क्षति की लागत भी केंद्र सरकार को वहन करनी चाहिये। गंगा की अविरल धारा का निर्धारण भी शीघ्रता से किया जाए क्योंकि ऐसा न होने से कई विकास कार्य लंबित हैं।

स्वच्छता से जुड़े उपायों को करते समय केंद्र सरकार स्थानीय लोगों की भावनाओं तथा राज्य की विधिसम्मत मांगों पर भी उचित विचार करे।

केदारनाथ के लिए मांगे 110 करोड़
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती से भेंट कर नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत केदारनाथ धाम में ढांचागत सुविधाओं के पुनर्स्थापन एवं पुनर्निर्माण के लिए110 करोड़, 39 लाख रुपये की परियोजना को शीघ्र स्वीकृत कर धन आवंटन का अनुरोध किया।

राज्य की कार्ययोजना में मंदाकिनी नदी पर डाइवर्जन, संगम एवं उसके दोनों ओर घाटों का निर्माण, केदारपुरी के चारों ओर नदी तट पर आरसीसी की रिटेनिंग दीवार का निर्माण आदि शामिल हैं।
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प्रधानमंत्री को गिनाई ये समस्याएं, पढ़‌िए

सीएम ने प्रधानमंत्री को राज्य की कई समस्याएं गिनाकर केंद्रीय सहयोग की अपेक्षा की। प्रधानमंत्री को जो समस्याएं गिनाईं गईं उनमें प्रमुख ये हैं-

-बरसात में समस्त नदियों में सिल्ट एकत्रित होना बाढ़ की सबसे बड़ी समस्या है। नदियों के किनारे की सिल्ट हटाने का अधिकार राज्य को दिया जाना चाहिए।
-शहरों एवं नदी के समीप स्थानों में आवश्यक रूप से एसटीपी औद्योगिक कचरा निस्तारण के प्लांट बनाने होंगे।
- राज्य ने वन क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र एवं बंजर भूमि में एक लाख चालखाल (वॉटर बॉडीज) का निर्माण प्रस्तावित किया है।
- राज्य में जल संचय किए बिना गर्मियों एवं जाड़ों में गंगा एवं यमुना का जल स्तर नहीं बढ़ा सकते हैं। बिना जल बढ़ाए कोई भी सफाई अभियान नाकाफी होगा।
- राज्य अपनी जल विद्युत उत्पादन क्षमता का विस्तार करना चाहता है ताकि राज्य इस दिशा में आत्मनिर्भर बने और अतिरिक्त बिजली का शुद्ध निर्यातक बन सके। जल विद्युत उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग कर राज्य हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के समान अतिरिक्त विद्युत उत्पादन वाला राज्य हो जाएगा।
-गंगा नदी के संरक्षण के लिए राज्य को उपयुक्त प्रतिपूर्ति दी जानी चाहिए। ईको सेंसिटिव जोन में 25 मेगावाट से कम क्षमता की ऐसी परियोजनाओं जिनसे पर्यावरण एवं ईकोलॉजी पर नगण्य प्रभाव पड़ता है, को चालू रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।
- सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय आबादी का असंतोष और उनकी आजीविका पर दुष्प्रभाव पड़ना राष्ट्रीय हित में उचित नहीं है। इसके लिए सुझाव है  गोमुख से हर्सिल के पास स्थित धराली तक 42 किलोमीटर के क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन में शामिल किया जाना चाहिए।

- वर्तमान में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की समस्त परियोजनाओं के लिए केंद्र एवं राज्य के वित्त पोषण का अनुपात 70:30 है। राज्य का अधिकांश क्षेत्र पर्वतीय है जिस कारण निर्माण की लागत अधिक आती है। अत: गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण की तरह प्राधिकरण की समस्त परियोजनाओं की लागत का 100 प्रतिशत वहन केंद्र सरकार करे।
- राज्य में शहरी स्थानीय निकाय पर्याप्त वित्तीय संसाधन उत्पन्न करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में नदियों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाई गई परिसंपत्तियों के संचालन और रख-रखाव केलिए पांच वर्ष की वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर 15 वर्ष के लिए केंद्र का अनुदान दिया जाए। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण से वित्त पोषण किया जाना चाहिए।

- श्रीनगर और गोपेश्वर सीवरेज और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट परियोजना तथा जगजीतपुर हरिद्वार में 40 एमएलडी क्षमता वृद्धि की परियोजनाएं राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की एम्पावर्ड स्टीयरिंग कमेटी में स्वीकृत की जानी है।
- जोशीमठ सीवरेज योजना और चंडी घाट के विकास के परियोजना में संशोधन किए जा रहे हैं। चार धाम यात्रा मार्ग एवं अन्य पर्यटक नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए परियोजनाएं  बनाई जा रही हैं।
-कोई भी योजना बनाते समय स्थानीय आबादी के आजीविका के मसलों और विकास की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।
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