दून के बच्चों और किशोरों को खेलने-पढ़ने की उम्र में टीबी हो रही है। फेफड़ों, आंत, लिंफ नोड्स और दिमाग की टीबी के केस अधिक आ रहे हैं। इनमें भी फेफड़े की टीबी वाले सबसे अधिक हैं। इस वजह से अन्य लोगों को भी संक्रमण का खतरा बना रहता है। बीते तीन महीनों में दून अस्पताल 19 बच्चों-किशोरों में टीबी की पुष्टि हुई है।
टीबी से ग्रसित बच्चे और किशोरों का दून अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में इलाज किया जा रहा है। अस्पताल के रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से जून तक 19 बच्चे और किशोरों में टीबी की पुष्टि हुई है। इनकी उम्र 6 से 17 साल के बीच है। एक तरफ टीबी मुक्त भारत बनाने का सपना देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर टीबी के मरीजों की संख्या कम नहीं हो रही है।
इस तरह बनती-बढ़ती है टीबी
दून अस्पताल के बाल रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गौरव मुखीजा ने बताया कि फेफड़ों की टीबी को ओपन केस ऑफ टीबी कहा जाता है। फेफड़ों की टीबी का इलाज समय पर न किया जाए तो यह धीरे-धीरे सिस्टमिक टीबी बन जाती है। टीबी शरीर में कहीं पर भी हो खून के रास्ते वह दूसरे अंगों में भी जा सकती है। खून में टीबी का बैक्टीरिया अन्य अंगों में पहुंचकर इंफेक्शन कर देता है और उस जगह की टीबी बन जाती है। इस तरह की टीबी को डिसेमिनेटेड टीबी कहते हैं।
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समय पर इलाज और बचाव की जरूरतI
डॉ. गौरव ने बताया कि फेफड़े की टीबी से ग्रसित व्यक्ति अगर बोलता भी है तो सांस के माध्यम से ड्रॉपलेट्स दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकती हैं जिससे दूसरा व्यक्ति भी संक्रमित हो सकता है। फेफड़े की टीबी के मरीज को समय पर इलाज और बचाव की बहुत जरूरत होती है। संक्रमण से बचाव के लिए बच्चों के परिजनों को टीबी की एक दवा दी जाती है। फेफड़े की टीबी एक से तीन, तीन से तीस, तीस से 300 और 300 से 3000 लोगों में फैल सकती है।