ब्यूटी ऑफ ग्रासलैंड (घास के मैदानों की शान) कहे जाने वाला विलुप्तप्राय दि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षी की प्रजाति बचाने के लिए कैप्टिव ब्रीडिंग कराई जाएगी।
अंडों को सेंटर के अंदर सुरक्षित रखा जाएगा। इनकी ब्रीडिंग में अबू धाबी की तकनीक इस्तेमाल होगी। जब इनसे बच्चे निकलेंगे तो सेंटर की देखरेख में उनकी परवरिश होगी। इसके बाद उन्हें मैदानों में छोड़ा जाएगा।
कैप्टिव ब्रीडिंग कराने के लिए अबू धाबी नवीनतम तकनीक भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) को उपलब्ध कराएगा।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के बैनर तले अमेरिकी द्वीप हवाई में हुए विश्व स्तरीय सम्मेलन में भारतीय वन्य जीव संस्थान और अबू धाबी के बीच यह समझौता हुआ है।
अबू धाबी दि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की कैप्टिव ब्रीडिंग के लिए तकनीक उपलब्ध कराने के लिए राजी हो गया है। वहां के विशेषज्ञ भारत आएंगे। बताया जाता है कि कैप्टिव ब्रीडिंग में अबू धाबी की तकनीक विश्व में सबसे अच्छे स्तर की है।
विभिन्न वन्य जीवों और पक्षियों के संरक्षण के कई मामलों में डब्ल्यूआईआई की विशेषज्ञता विश्व में सबसे बेहतर है। अबू धाबी को भी इसे उपलब्ध कराया जाएगा।
दि ग्रेड इंडियन बस्टर्ड भारत और पाकिस्तान में पाया जाता है। विश्व में दो सौ से ढाई सौ के बीच इंडियन बस्टर्ड बचे हुए हैं। घास के मैदानों के खत्म होने और शिकार की वजह से इनकी संख्या घटती चली गई।
इसके अलावा घास के मैदानों के बीच से सड़कें बन जाने से इंडियन बस्टर्ड के वासस्थल नष्ट हो गए। इसके साथ ही वासस्थलों के ऊपर से बिजली के तारों के निकलने से भी पक्षियों का हानि पहुंची है। पक्षी जब दूसरे वासस्थलों में पहुंचे तो इनका शिकार कर लिया गया।
अबू धाबी में बस्टर्ड की दूसरी प्रजातियां हैं। वे प्रजातियों भी खतरे में हैं। अबू धाबी में नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल कर कैप्टिव ब्रीडिंग कराई जा रही है। इस संबंध में उनसे समझौता हुआ है। अबूधाबी अपनी तकनीक देगा, वहां के विशेषज्ञ भी यहां आएंगे।
- डा. वीबी माथुर, निदेशक, भारतीय वन्य जीव संस्थान